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मनमोहन सरकार का एक साल | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत में सत्तारूढ़ संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन यानी यूपीए की सरकार ने रविवार 22 मई, 2005 को एक साल पूरा किया है. वामपंथी दलों के समर्थन से चल रही मनमोहन सिंह की सरकार अपनी उपलब्धियाँ गिनाने में जुटी है तो दूसरी ओर विपक्ष का कहना है कि सरकार जनता से किए अपने वादों को पूरा करने में नाक़ाम रही है. सरकार को समर्थन दे रहे वामपंथी दल भी विदेशी पूंजी निवेश, निजीकरण, मज़दूरों और आदिवासियों के अधिकारों जैसे कई मुद्दों को लेकर नाख़ुश हैं. पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह किसी दल से जुड़े नहीं है और वह आजकल जनता के मुद्दों को विभिन्न मंचों से उठा रहे हैं. सिंह सरकार की नीयत और दिशा को ठीक मानते हैं लेकिन उन्हें इस सरकार से ग़रीब तबके के लिए और काम की उम्मीद थी. वीपी सिंह कहते हैं, ''मेरी समझ में एक साल में सरकार की दो उपलब्धियाँ रही हैं. पहली यह कि भारत और पाकिस्तान के संबंधों को सुधारने की दिशा में सार्थक प्रयास हुए. दूसरा यह कि चीन ने सिकिम्म को भारत का हिस्सा माना.'' प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से सभी को बड़ी उम्मीदें हैं. सरकार से लेकर विपक्ष तक सीधे मनमोहन सिंह को निशाना बनाने से बचते हैं. पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह मनमोहन सिंह के कामकाज के तरीके से खुश हैं. कांग्रेस संतुष्ट सत्तारूढ़ कांग्रेस भी सरकार के कामकाज से पूरी तरह संतुष्ट नज़र आती है. कांग्रेस का मानना है कि हालांकि एक साल बहुत कम समय है. फिर भी इस दौरान 26 विधेयक पारित हो गए. इसमें सूचना का अधिकार जैसे महत्वपूर्ण विधेयक शामिल थे. प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री पृथ्वीराज चौहान कहते हैं, ''सरकार ने अपने न्यूनतम साझा कार्यक्रम को पूरा करने में काफ़ी हद तक सफ़लता पाई है और अगर विपक्ष अपनी भूमिका का निर्वहन करता तो और भी कई विधेयक पारित होते.'' उनका कहना है कि ख़ासकर आर्थिक मामलों में काफ़ी अनुकूल माहौल है और दूसरे देशों के लोगों को लगने लगा है कि आर्थिक उदारीकरण का दौर जारी है. भाजपा नाराज़ लेकिन मुख्य विरोधी दल भारतीय जनता पार्टी इस सरकार को पूरी तरह नाकामयाब मानती है. भाजपा का मानना है कि यह सरकार भाजपा विरोध के कारण अभी तक बची रही है. भाजपा का कहना है कि यूपीए सरकार के बजाए भाजपा के विरोधी दल की तरह व्यवहार कर रही है. भाजपा ने सरकार और उसके सहयोगियों के विरोध में अधिकांश समय संसद का बहिष्कार किया. यहाँ तक कि बजट भी बिना विपक्ष की आलोचना के पारित हो गया. भाजपा को सरकार से ज़्यादा वामपंथियों के दबाव को लेकर आपत्ति रही है. भाजपा के वरिष्ठ नेता डॉक्टर मुरली मनोहर जोशी कहते हैं,'' कामकाज पर क्या टिप्पणी करें. टिप्पणी तो वहाँ हो सकती है, जहाँ काम हुआ हो. कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं है जिसके बारे में कहा जा सके कि इस सरकार ने कोई नई चीज़ शुरू की है.'' उनका कहना है कि न तो कोई नई सोच या विचार सामने आया है. अगर काम बंद करने को ही कामकाज कहें तो ज़रूर कुछ टिप्पणी की जा सकती है जैसे शिक्षा के क्षेत्र में मैंने कई चीज़ें शुरू की थीं जिसे इस सरकार ने बंद कर दिया. वामपंथियों का आकलन लेकिन वामपंथी दल इन दिनों उत्साहित नज़र आते हैं. यूपीए सरकार उनके समर्थन से बनी है और चल रही है. उन्होंने कोई मंत्रालय नहीं लिया.वामदलों ने सत्ता की माया से मुक्त रहकर सत्ता को साधा. संसद में और उसके बाहर यूपीए के साथ वामदलों ने ‘कभी नरम कभी गरम’ की नीति अपनाई. यह एक कठिन स्थिति भी है. सरकार चलती रहे और वामपंथी अपनी मौजूदगी और दबाव भी दर्ज करा सकें. सीपीएम नेता मोहम्मद सलीम का मानना है, '' कुछ अच्छी बातें हैं पर जैसा हम लोग सोचते थे, वैसा भी नहीं है. सांप्रदायिकता के सवाल पर ही लें तो स्थितियाँ पूरी तरह से नियंत्रण में हैं.'' वो कहते हैं,'' लेकिन आरएसएस जैसे संगठनों को जिस तरह से लगाम लगनी चाहिए थी, अभी उसमें कसर बाकी है.'' इसमें कोई शक नहीं कि भारत में लोग प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और की ओर उम्मीद से देख रहे हैं. कांग्रेस के लिए भी राष्ट्रीय स्तर पर साझा सरकार चलाने का यह पहला अवसर है. एक साल का सफ़र यूपीए सरकार के लिए अपने काम की समीक्षा का एक अवसर भी है और चुनौती भी कि वह अपने संकल्पों पर पर कितनी खरी उतरी है. |
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