|
विश्वयुद्ध के भारतीय जाँबाज़ों की यादें | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
साठ साल पहले ब्रितानी लोग यूरोप में दूसरे विश्व युद्ध की समाप्ति पर ख़ुशियाँ मना रहे थे लेकिन एशिया में युद्ध जारी था. पूर्व में जापानी सेना ने ब्रितानी उपनिवेश के बहुत से हिस्से को अपने क़ब्ज़े में ले लिया था और उसने आत्मसमर्पण नहीं किया था. सहयोगी देशों की सेना का एक बड़ा हिस्सा भारतीयों से बना हुआ था जिन्होंने जापानियों का पीछा करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की. उस युद्ध में भारत के कुछ जाँबाज़ों के तजुर्बों की बात करें तो पंजाब के एक छोटे से गाँव नंदापुर कलौर में आज भी उस युद्ध के सिख फौजी नियमित रूप से मुलाक़ातें करते हैं. राइफ़लमैन जागीर सिंह बताते हैं कि उन्होंने इतालवी सैनिकों के साथ आमने-सामने लड़ाई की थी और उस लड़ाई में वो हुनर आज़माए थे जो उन्होंने गाँव में कुश्ती में सीखे थे. सूबेदार मंसर सिंह याद करते हुए कहते हैं कि पटियाला के महाराजा ने लड़ाई के बाद एक आलीशान समारोह का आयोजन किया था. इन सैनिकों ने जिस सेना का हिस्सा बनकर लड़ाई की उसकी संख्या क़रीब पच्चीस लाख थी और उसमें हिंदू, मुसलमान और सिख सभी शामिल थे. 1947 में देश विभाजन के बाद बहुत से मुसलमान पाकिस्तान चले गए.
उन सैनिकों ने धार्मिक तनावों के बावजूद कंधे से कंधा मिलाकर लड़ाई की और यहाँ तक कि उन्होंने महात्मा गाँधी के उस नारे की भी अनदेखी की जिसमें उन्होंने कहा था - अंग्रेज़ो भारत छोड़ो. परंपरा बहुत से सिखों ने एक ही रेजीमेंट में काम किया था और यह एक परंपरा सी बन चुकी है. मुझसे बहुत से पूर्व सैनिकों ने कहा, "हमारे लिए रेजीमेंट ही सबकुछ थी." लेकिन जब युद्ध की घोषणा हुई तो परंपरागत सेना युद्ध के लिए पूरी तरह से प्रशिक्षित नहीं थी या उसके पास पूरे हथियार नहीं थे. लेकिन दूसरे विश्व युद्ध में ब्रितानी सैन्य अधिकारियों और भारतीय सैनिकों के बीच जो संबंध क़ायम हुए थे उसने बहादुरी की नई मिसालें क़ायम कीं और सेना की संख्या भी काफ़ी ज़्यादा हो गई थी. समस्याएँ लेकिन अचानक सेना के विस्तार से बहुत सी समस्याएँ भी पैदा हुईं. भारतीय सेना के एक आंतरिक दस्तावेज़ से पता चलता है कि नए इलाक़ों से जो लोग सेना में भर्ती किए गए उनमें से बहुत से पूरी तरह तंदरुस्त नहीं थे.
सिखों की तरह से उनकी पृष्ठभूमि सैनिक नहीं रही. पंजाब से बड़ी संख्या में लोग सेना में रहे हैं. राष्ट्रवाद दूसरे विश्व युद्ध से पहले हालाँकि ब्रितानी सैन्य अधिकारियों और कुछ भारतीय सैनिकों के बीच झड़पों की घटनाएँ हुई थीं लेकिन युद्ध के दौरान जो दोस्ती बनी वह लंबे समय तक क़ायम रही. लेकिन आगे चलकर भारतीय सैनिकों के मनोबल में कुछ बदलाव देखा गया. सिंगापुर के आत्मसमर्पण के बाद बड़ी संख्या में भारतीय सैनिको और अधिकारी उस आज़ाद हिंद फौज में शामिल हो गए जिसने जापानी सेना का साथ दिया था. आज़ाद हिंद फौज का नेतृत्व करिश्माई व्यक्तित्व वाले नेता सुभाष चंद्र बोस के हाथों में था. सुभाष चंद्र बोस का मानना था कि जापानी सेना भारत को आज़ादी दिलाने में मदद कर सकती है. स्मृतियाँ कोहिमा में पेड़ों से घिरी हुई एक क़ब्रगाह है जहाँ न सिर्फ़ भारतीय सैनिक बल्कि ब्रितानी-अफ्रीका और कुछ अन्य औपनिवेशिक सैनिक दफ़्न हैं. उन सभी ने बर्मा अभियान में हिस्सा लिया था. क़ब्रगाह में एक पत्थर पर खुदा हुआ है, "जब आप अपने घर जाएँ तो हमारे बारे में बताएँ कि हमने आपके आने वाले कल के लिए अपना आज क़ुर्बान कर दिया." लेकिन अफ़सोस की बात है कि यह कहने में हमें बहुत वक़्त लगा है. |
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||