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बैंगलोर में फिर अंग्रेज़ी का विरोध | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत की आईटी राजधानी बंगलौर में, अंग्रेज़ी विरोधी संगठन एक बार फिर सक्रिय हो गए हैं. इन संगठनों का मानना है कि बंगलौर में ग़ैर-कन्नड़ भाषी लोगों की बढ़ती आबादी के चलते, कर्नाटक की राज्यभाषा, कन्नड़ का अपमान हो रहा है. लेकिन दूसरी ओर चिंता है कि अंग्रेज़ी में ध्यान न देने से कहीं बच्चे आगे आने वाले दिनों में पिछड़ न जाएँ. आईटी यानी सूचना तकनीक उद्योग में काम करने के लिए अंग्रेज़ी भाषा का ज्ञान ज़रूरी है. सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में अंग्रेज़ी छठवीं कक्षा से पढ़ाई जाती रही है लेकिन अब कर्नाटक की सरकार ने प्रस्ताव रखा है कि छठवीं कक्षा के बदले चौथी कक्षा से अंग्रेज़ी पढ़ाई जाए. आम लोग इस प्रस्ताव से ख़ुश हैं. लेकिन ज़्यों ही यह प्रस्ताव आया “कन्नड़ रक्षिने वेदिके” संस्था के कार्यकर्ता सक्रिए हो गए हैं. बोर्ड काला करने का सिलसिला यह संगठन पहले 90 के दशक में भी अंग्रज़ी के ख़िलाफ़ आंदोलन चला चुका है.
वेदिके के नारायण गौडा अंग्रेजी पढ़ाए जाने के सख़्त ख़िलाफ़ हैं. वे कहते हैं, “कन्नड़ भाषा हमारी राज्य की भाषा है और इसकी जगह अंग्रेज़ी नहीं सिखाई जानी चाहिए. सरकार, अंग्रेज़ी की शिक्षा शुरू कर बहुत ग़लत कदम उठाएगी. हम इसे रोकने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं.” यह संगठन अंग्रेज़ी हटाए जाने के लिए एक बार फिर शहर में अंग्रेज़ी में लगे होर्डिंग और दुकानों के बोर्डों पर काला पेंट फेंकने लगे हैं. मध्य बंगलौर में ब्रिगेड रोड पर बनी दुकानों के कई बोर्ड काले कर दिए गए हैं. इस दबाव के चलते शहर के महापौर ने दुकान मालिकों को एक महीने के भीतर दुकान के नाम कन्नड़ में प्रमुखता से लगाने का निर्देश दिए हैं. दुकान मालिकों से कहा गया है कि बोर्ड पर कन्नड़ के अक्षर अंग्रेज़ी अक्षरों से छोटे नहीं हो सकते. इसके बाद कुछ दुकान मालिकों ने अपने बोर्ड बदलने शुरू कर दिए हैं. वहीं मुजाहिद जैसे कुछ दुकानदार इस सब से तंग आ गए हैं. उनकी दुकान के सामने टंगा बोर्ड पूरी तरह से काला कर दिया गया है और नाम तक पढ़ा नहीं जा सकता. मगर मुजाहिद नए निर्देशों का इंतज़ार कर रहे हैं. वे कहते हैं, “दो बार हमने बोर्ड बदला लेकिन कन्नड़ समर्थक संतुष्ट नहीं हैं. अब हमने तय किया है कि जब तक इस मामले पर साफ़ निर्देश नहीं मिलते हम इसी बोर्ड को टंगा रहने देंगे.” “पार्क एवेन्यू” शोरूम के सामने लगे बोर्ड पर अब अंग्रेज़ी और कन्नड़ में नाम साथ-साथ लिखे गए हैं. लेकिन कुछ दुकानों में अंग्रेज़ी के बोर्ड हैं और किनारे पर कन्नड़ में नाम लिखे गए हैं. यह सब अब ग़लत माना जा रहा है. दबाव
वैसे भी मध्य बंगलौर से जैसे ही आप चलें तो सड़कों के नाम आमतौर पर केवल कन्नड़ भाषा में लिखे दिखते हैं. शहर में देश के विभिन्न हिस्सों से आए लोग आईटी उद्योग में काम करते हैं और उनमें से अधिकतर लोग कन्नड़ नहीं पढ़ सकते. लेकिन शहर के बसों पर केवल नम्बर अंग्रेज़ी में लिखा रहता है. सूरेन बंगलौर की एक आईटी कंपनी में काम करते हैं और उनका कहना है, “हम बस में सवारी चाहकर भी नहीं कर सकते क्योंकि कर्नाटक के बाहर से आए हम लोग कुछ नहीं पढ़ सकते कि बस कहाँ जा रही है.” राजनीतिक समर्थन “अंग्रेज़ी हटाओ” मुहिम को राजनीतिक दल और राजनेता पीछे से समर्थन दे रहे हैं. विश्लेषक गिरीश निकम कहते हैं, “भाषा के प्रति रूढ़ीवादी सरकार पर लगातार दबाव बनाए रखते हैं और जैसा कि राजनेताओं स्वभाव होता है, वो उसे समर्थन देते हैं क्योंकि उन्हें डर है कि उन्हें वोट नहीं मिलेंगे. लेकिन प्रशासन में कई लोग आज की दुनिया में अंग्रेज़ी का महत्त्व जानते हैं और वो इन संगठनों को बंगलौर पर हावी नहीं होने देंगे.” कुछ महीनों पहले जनता दल (एस) नेता और उपमुख्यमंत्री, सिद्दरामैया ने विधानसभा में कहा कि बंगलौर की 65 लाख जनसंख्या में 30 प्रतिशत कन्नड़ भाषाई हैं. इस बयान से कन्नड़ समर्थकों को और बल मिला. राजनीतिक प्रशासन इतना डरा हुआ है कि आईटी क्षेत्र के दिग्गज़ों और कई प्रमुख लोगों के कहने के बाद भी बंगलौर पुलिसकर्मियों को अंग्रेज़ी की शिक्षा देने के मुद्दे पर वो चुप्पी साधे बैठे हैं. |
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