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तोहफ़े का घोड़ा नियमों से लंगड़ा | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत और पाकिस्तान के बीच की खाइयों को पाटने के लिए वह घोड़ा एक तोहफ़े के तौर पर दिया गया था लेकिन नियमों की पेचीदगियों ने उसे मंज़िल पर पहुँचने से पहले ही लंगड़ा बना दिया. पाकिस्तानी पंजाब के मुख्यमंत्री चौधरी परवेज़ इलाही ने भारतीय पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिन्दर सिंह को यह घोड़ा तब भेंट किया था जब सिंह जनवरी 2004 में वहाँ की यात्रा पर गए थे. सुल्तान नाम का यह घोड़ा अरबी नस्ल का है जिसे बहुत उम्दा माना जाता है लेकिन लोगों के स्तर पर तो दोनों देशों के बीच संपर्क बढ़ रहा है मगर सुल्तान के मामले से तो यही नज़र आता है कि बेज़ुबान जानवरों को शायद अभी यह मौक़ा नसीब नहीं हो रहा है. सुल्तान नियम और क़ानूनी बाधाओं की वजह से अमरिन्दर सिंह के साथ एक पंजाब से दूसरे पंजाब नहीं जा सका था. सुल्तान को 14 महीनों तक अस्तबल में बंद रखा गया और वह बेचारा भारत की सरज़मीं पर क़दम रखे बिना ही इंतज़ार में लंगड़ा हो गया. अब सुल्तान के स्थान पर कोई दूसरा घोड़ा तलाश किया गया है लेकिन उसे भी ऐसी ही कुछ बाधाओं का सामना करना पड़ेगा जैसाकि सुल्तान को करना पड़ा.
भारत में कोई भी पालतू जानवर आयात करने के लिए कड़े नियम हैं और ऐसे जानवरों को एक निश्चित अवधि तक निगरानी में रखा जाता है. वाघा सीमा चौकी के निकट एक स्थान पर सुल्तान की जाँच पड़ताल की गई थी. लेकिन सुल्तान का 14 महीने तक इंतज़ार उसकी सेहत के लिए ख़तरनाक साबित हुआ और अधिकारियों का कहना है कि शायद चलने-फिरने और अभ्यास के अभाव में सुल्तान की टाँगों में जकड़न हो गई. उधर कुछ विशेषज्ञों ने ऐसे कड़े नियमों के औचित्य पर ही सवाल उठाया है. उनका कहना है कि बहुत से जानवर यूँ ही सीमा के इस तरफ़ आते-जाते रहते हैं तो फिर इस तरह के कड़े नियमों का क्या औचित्य है? |
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