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भूलेंगे नहीं अपने स्वागत को यात्री | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत-पाकिस्तान रिश्तों के इतिहास में गुरुवार को एक नया अध्याय लिखा गया और पहली बार नियंत्रण रेखा के दोनों ओर के कश्मीर के बीच सड़क मार्ग खुल गया. बस यात्रा के एक दिन पहले ही श्रीनगर में हुए चरमपंथी हमले के बावजूद इस यात्रा को लेकर घाटी में उत्साह में कमी नहीं आई. मुज़्ज़फ़राबाद से आने वालों का जैसा स्वागत नियंत्रण रेखा के इस पार हुआ है और जैसा अपने यात्रियों को लोगों ने रवाना किया है उसने संकेत दे दिए हैं कि जम्मू-कश्मीर में आगे आने वाले दिनों में बहुत से बदलाव देखने को मिलने वाले हैं. और इसमें कोई शक की गुंजाइश नहीं है कि ये बदलाव घाटी के हक़ में ही होंगें. तैयारियाँ और सुरक्षा इस बस सेवा शुरु होने के असर पर तो गंभीर चर्चा होगी लेकिन पहली बस की रवानगी और आमद को देखें तो इसके दो हिस्से हैं. एक हिस्सा वह है जो सरकारी आयोजनों से जुड़ा है और दूसरा वह है जो स्वत: स्फ़ूर्त था यानी सरकारी आयोजन से अलग.
सरकारी आयोजन का जहाँ तक सवाल है तो तगड़े सुरक्षा व्यवस्था के बीच भी पर्यटक केंद्र पर हुए हमले को छोड़ दें तो जम्मू कश्मीर और केंद्र सरकार ने कोई भी कसर नहीं छोड़ी. सुबह 11 बजे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गाँधी ने कई केंद्रीय मंत्रियों की उपस्थिति में जहाँ बस को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया वहीं बस यात्रियों के साथ सत्तारुढ़ पी़डीपी की अध्यक्ष महबूबा मुफ़्ती ने ख़ुद सलामाबाद तक की यात्रा की. उधर मुख्यमंत्री मुफ़्ती मोहम्मद सईद मुज़फ़्फ़राबाद से आने वाले यात्रियों को लेने पहुँचे थे. दोनों ओर के यात्रियों के स्वागत के लिए दिन रात एक करके नियंत्रण रेखा से 14 किलोमीटर दूर सलामाबाद में एक पर्यटक केंद्र स्थापित किया गया और वहाँ स्वागत की सरकारी ढंग की तैयारियाँ की गईं थीं. मसलन स्कूली बच्चों को पारंपरिक पोशाक पहनाकर दिन भर खड़ा रखा गया. सरकारी बैंड बजता रहा और यात्रियों को खाना आदि खिलाने का इंतज़ाम किया गया. हालांकि उसमें भी आत्मतीयता की कमी नहीं दिखती थी. असरकारी लेकिन ज़्यादा उल्लेखनीय वह था जिसका सरकार से कोई लेना देना नहीं था. जब हम सुबह पत्रकारों को ले जाने वाली बस से सलामाबाद की ओर जा रहे थे तब हमें लग रहा था कि सुरक्षा बंदोबस्त के कारण सन्नाटा पसरा हुआ है. सलामाबाद पहुँचे तो देखा कि सड़के के किनारे लोग खड़े हुए हैं. कोई दो सौ रहे होंगे. तब लगा था कि सरकार ने इन्हें बुलवा रखा होगा. रैली के लिए बुलाए जाने वाले भाड़े के लोगों की तरह. लेकिन धीरे-धीरे यह भीड़ बढ़ने लगी. और जब जाकर पूछताछ की तो पता चला कि वे आसपास के गाँवों के लोग हैं जो अपना काम छोड़कर यात्रियों को देखने आए हैं. ट्रक चलाने वाले राशिद आलम ने अपनी ट्रक खड़ी कर दी थी. उन्होंने कहा,"मुज़फ़्फ़राबाद से जो लोग आ रहे हैं वे भी अपने ही तो भाई बंधु हैं उनके स्वागत के लिए क्या मैं इतना भी न करूँ.2 इस जवाब को वहाँ आठ घंटे खड़ी भीड़ के प्रतिनिधि जवाब की तरह भी देखा जा सकता है. भीड़ बढ़ती रही और लोग कड़ाके की सर्दी और हल्की बारिश के बीच भी सड़के के किनारे डटे रहे. बच्चे बूढ़े, औरत-मर्द सभी. जितनी महिलाएँ वहाँ थीं उतनी सरकार किसी रैली के लिए भी नहीं जुटा पाती. इतना भर नहीं शाम होते होते बारिश होने लगी थी और जब पर्यटक केंद्र से बस श्रीनगर के लिए रवाना हुई तो हमने वो देखा जिसकी कल्पना जम्मू कश्मीर सरकार और केंद्र सरकार को भी नहीं रही होगी. सलामाबाद से श्रीनगर के सवा सौ किलोमीटर के रास्ते में कोई सौ मीटर ऐसा नहीं मिला जहाँ सड़के के दोनों ओर लोग बस यात्रियों के स्वागत में लोग न खड़े हों. चाहे वह बूनियार और शीरी जैसे छोटे गाँव हों या उड़ी और पट्टन जैसा तहसील मुख्यालय. और बारामुला में तो लोगों का मानों सैलाब ही उमड़ आया था. सैकड़ों या कहें कि हज़ारों लोग सड़क के दोनों ओर खड़े बस के स्वागत में खड़े थे और हाथ हिला-हिलाकर लोगों का स्वागत कर रहे थे. बारिश हो रही थी लेकिन लोगों को परवाह नहीं थी. पूरा का पूरा परिवार सड़क के किनारे खड़ा था, कुछ छतरी लेकर आए थे तो कुछ अपने घरों की खिड़कियों और बालकनियों में खड़े हाथ हिला रहे थे. बस का समय जिस तरह गड़बड़ाया और बस जिस तरह देर हुई उससे स्पष्ट था कि लोगों को इसी तरह घंटो खड़े रहना पड़ा होगा. स्वागत और फिर आख़िर में श्रीनगर का स्वागत जहां जगह जगह बड़ी भीड़ थी शोर मचाकर स्वागत करती हुई. हालाँकि दुकानें बंद होने से श्रीनगर की सड़के सूनी थीं और कड़ी सुरक्षा ने इसे बढ़ा दिया था. पूरे रास्ते एकाध अपवाद को छोड़कर कोई नारेबाज़ी आदि सुनाई नहीं पड़ी. इसमें कोई दो राय नहीं कि मुज़फ़्फ़राबाद के यात्री इस स्वागत को अपने जीते जी नहीं भुला पाएँगे. लेकिन इससे ज़्यादा महत्व इस बात का है कि जो अलगाववादी गुट ये दावा कर रहे थे कि ये बस सरकार की बस है जनता की नहीं उन्हें शायद जनता का जवाब मिल ही गया होगा. |
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