| बहुत अलग हैं दोनों ओर के यात्री | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
श्रीनगर से जो लोग मुज़फ़्फ़राबाद गए और वहाँ से जो लोग आए उन पर एक सरसरी नज़र डालकर भी अंदाज़ा होता है कि दोनों तरफ़ के लोगों में बहुत अंतर है. मुज़फ़्फ़राबाद से आने वाले लोगों में ज़्यादातर लोग संभ्रांत कहे जाने वाले उच्च और उच्चमध्यमवर्गीय लोग हैं जो ज़िंदगी में एक मुकाम हासिल कर चुके हैं. वहीं श्रीनगर की बस में जो लोग गए वे साधारण परिवारों के आम नागरिक हैं. साफ़ दिखता है कि पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर की सरकार ने अपनी सूची बनाते हुए ख़ासी सावधानी बरती है और बहुत सी बातों को ध्यान में रखा है. मुज़फ़्फ़राबाद से जो लोग आए हैं उनमें एक लाहौर हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज हैं तो एक लेखक, एक अख़बार के मालिक तो एक ज़मींदार तो कोई कुछ और. ज़ाहिर है कि सैय्यद शरीफ़ अहमद से लेकर प्रीतम खयानी तक ये वे लोग हैं जिनकी समाज में अपनी एक अलग हैसियत है. अलबत्ता हैं ज़्यादातर लोग मुज़फ़्फ़राबाद इलाक़े के ही. मक़सद इनमें से कुछ का मक़सद तो अपने रिश्तेदारों से मिलना भी नहीं है क्योंकि उनके कोई रिश्तेदार ही नहीं हैं भारत प्रशासित कश्मीर में. मसलन प्रीतम खयानी एक लेखक हैं और वे श्रीनगर इसलिए आए हैं क्योंकि उन्हें अपने पिता की जायदाद की खोज ख़बर लेनी है. उनके रिश्तेदारों से उनका कोई संपर्क भी नहीं है. लेकिन दूसरी ओर श्रीनगर से मुज़फ़्फ़राबाद जाने वाली बस में ज़्यादातर लोग बारामुला और उड़ी क्षेत्र से हैं या फिर जम्मू से. बारामूला में तो कुछ धनाड्य रहते हैं लेकिन ज़्यादातर लोग साधारण परिवारों के ही हैं. चाहे वे ग़ुलाम हैदर हों या मोहम्मद असलम. उड़ी के डीआईजी राजा ऐजाज़ के जीजाजी और मामाजी को छोड़ दें तो ऐसा कोई यात्री ऐसा नहीं है जिसके बारे में कोई बता सके कि वे किसी परिचित ख़ानदान से हैं. आम बनाम ख़ास स्थानीय पत्रकार मानते हैं कि इसके दो कारण है. एक तो यह कि भारत प्रशासित कश्मीर की सरकार ने लोकतांत्रिक तौर तरीक़ो से ही लोगों का चयन कर लिया और आम लोगों को ज़्यादा मौक़ा दिया लेकिन नियंत्रण रेखा के दूसरी ओर के कश्मीर में अभी लोकतंत्र के पाँव इतने मज़बूत नहीं है कि इस ओर जैसी प्रक्रिया होगी.
दूसरा यह कि पढ़े-लिखे और अपना मुकाम हासिल लोगों के आने से एक तरह से पाकिस्तान प्रशासन आश्वस्त रह सकता है कि वे अपनी इस छोटी यात्रा में किसी प्रभाव में नहीं आएँगे. विशेषज्ञ मानते ही हैं कि भारत को लगता है कि पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के लोगों को यदि भारत प्रशासित कश्मीर को देखने का मौक़ा मिल जाए तो उनकी बहुत सी शिकायतें दूर हो सकती हैं और दोनों के बीच की दूरी भी कम हो सकती है. लेकिन यह तभी संभव है जब संपर्क आम लोगों के बीच हो, एक समान सामाजिक दायरे वाले लोगों के बीच. हो सकता है कि आने वाले दिनों में चीज़े कुछ बदलें. |
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