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'राजनीति में अवकाश की उम्र नहीं हो सकती' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
मैं उम्र को रिटायर होने की कसौटी नहीं मानता हूँ. जब तक व्यक्ति सक्षम है जिस उम्र तक दिमाग और शरीर सक्रिय है उस समय तक उसका उपयोग किया जाना चाहिए. मेरी स्पष्ट राय है कि सार्वजनिक जीवन में अवकाशग्रहण करने की कोई उम्र नहीं हो सकती. मैं इस सोच से सहमत नहीं हूँ कि एक उम्र के बाद राजनीति से अवकाश ले लेना चाहिए. दरअसल राजनीति अन्य कार्यों से अलग तरह का काम है. इसकी ज़रूरतें अलग हैं, मूल प्रेरणा अलग है. राजनीति में लोग अलग प्रेरणा से आते हैं. निजी और सार्वजनिक क्षेत्र में कार्य करने में बुनियादी अंतर है. अब कुछ लोग अवकाशग्रहण करने के बाद राजनीति या समाजसेवा के क्षेत्र में आते हैं. इस तर्क से तो उनका प्रवेश ही बंद हो जाएगा. मेरी राय है कि यह व्यक्ति पर निर्भर है कि वह तय करे कि कब तक ज़िम्मेदारी उठा सकने की क्षमता रखता है तब तक उसे सार्वजनिक जीवन में रहने की छूट मिलनी चाहिए. यदि भाजपा और वामपंथी पार्टियों की तुलना करें तो वामपंथी पार्टियों में लोकतंत्र ज़्यादा है. उनमें व्यक्ति पूजा नहीं है.वहां सिद्धांत और नीतियाँ अहम हैं. भाजपा वामपंथी पार्टियों जितनी लोकतांत्रिक पार्टी नहीं है. भाजपा में शिखर पुरुषों का एक आभामंडल है. इसमें कोई शक नहीं कि अटल बिहारी वाजपेयी जो कहते हैं, उसके राजनीतिक रूप से गहरे अर्थ होते हैं. इसलिए उनके बयान के यदि राजनीतिक अर्थ निकाले जा रहे हैं, तो उस पर आश्चर्य नहीं किया जाना चाहिए. लेकिन मेरी राय है कि उम्र की सीमा से राजनीति का कोई भला नहीं होने वाला है. (आशुतोष चतुर्वेदी से बातचीत पर आधारित) |
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