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संघ परिवार में मतभेद सामने आए | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
हाल में आरएसएस के शीर्ष नेता के सुदर्शन के भाजपा नेतृत्व पर बयान ने पार्टी में हड़कंप मचा दिया है. इस बाबत आरएसएस को करीब से जानने वाले और संघ के इतिहासकार देवेंद्र स्वरूप कहते हैं, “मीडिया में सरसंघचालक की टिप्पणी को जैसे देखा जा रहा है वह ठीक नहीं. संघ का प्रयास रहा है कि नए लोग सामने आएँ और अगर वे ऐसा कहते हैं तो इसका मतलब ये नहीं है कि वो मौजूदा नेतृत्व की अलोचना कर रहे हैं.” भाजपा पर नज़र रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सिंह कहते हैं कि आरएसएस की नाराज़गी भाजपा से इसलिए बढ़ी है क्योंकि सत्ता में रहकर पार्टी ने अपने एजेंडे को पूरा नहीं किया. वो कहते हैं, “आरएसएस की नाराज़गी यह है कि भाजपा, सत्ता में रहकर जो कर सकती थी उसने वह नहीं किया. जैसे अदालत के फैसले के बाद विश्व हिन्दू परिषद को अविवादित भूमि वापस की जा सकती थी.” प्रदीप सिंह मानते हैं, “आर्थिक मुद्दों पर स्वदेशी जागरण मंच और भारतीय मज़दूर संघ को सरकार की नीतियों पर आपत्ति रही. सबसे बड़ी बात यह रही कि सरकार और संघ के बीच संवादहीनता बनी रही.” जनसंघ के संस्थापकों में से एक बलराज मधोक कहते हैं, “आरएसएस विचारोन्मुख संगठन नहीं, नियंत्रण-उन्मुख संगठन है. अटल बिहारी वाजपेयी की कोई विचारधारा नहीं है पर जब उन्हें सत्ता मिली तो उन्होंने अपनी सत्ता के छह वर्षों में संघ को नज़रअंदाज़ किया. उनका कहना है कि इसलिए अब संघ अपनी नाराज़गी दिखा रहा है और दोनों के बीच के मतभेद सामने आ रहे हैं. सफ़र पार्टी के सफ़र को देखें तो जनसंघ के एकात्म मानववाद को छोड़कर जनता पार्टी ने गाँधीवादी समाजवाद की बात की. जयप्रकाश नारायण और गाँधी के पदचिन्हों पर चलने की बात की पर 1980 के दशक में हुई बुरी गत के बाद पार्टी ने संघ की चाल चलने का मन बनाया. 1998 में सत्ता की मजबूरियाँ देखते हुए पार्टी ने नीतियाँ बदली जिसके बाद संघ परिवार और भाजपा के बीच संबंध, उतार-चढ़ाव देखते रहे. इन 25 सालों में भाजपा ने ये तो जाना है कि बिना आरएसएस कॉडर के उसका चुनावों में सफलता पाना मुश्किल है पर साथ ही अपने वोट बैंक को नकारने की कीमत भी पार्टी जानती है. जिस तेजी से भाजपा उभरी है और उसने सत्ता का स्वाद चखा और फिर सत्ता के बाहर रहने पर मजबूर हुई उसकी छाप भी पार्टी पर पड़ी है. प्रदीप सिंह का कहना है कि सब कुछ इतनी तेज़ी से हुआ है और पार्टी के नई पीढ़ी के नेता उतने परिपक्व नहीं हो पाए हैं. इन 25 सालों के सफ़र के बाद पार्टी अब अपने कॉडर के सामने अयोध्या, धारा-356 या समान नागरिक संहिता की बात नहीं करती है वहीं कांग्रेस के इस दौरान फिर उभरने ने उसकी चिंताएँ भी बढ़ाई हैं. भाजपा शायद अब यह भी न कह पाए कि वह ‘पार्टी विद अ डिफरेंस’ है यानी सबसे अलग है. इस बारे में देवेंद्र स्वरूप कहते हैं, “भारत के सामने सबसे बड़ा संकट राजनीतिक प्रणाली का है. इस राजनीतिक प्रणाली में भ्रष्टाचार मुक्त समाज का निर्माण संभव नहीं है. आज जो भ्रष्ट और दाग़ी है, वो बार-बार चुनाव जीत रहे हैं.” भाजपा का राजनीतिक रथ इन वर्षों में कई पड़ावों से गुज़रा है. पर संघ की उससे नाराज़गी पार्टी के लिए चिंता का विषय है. |
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