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'राजनीति में भी अवकाशग्रहण की उम्र होनी चाहिए' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
जीवन के हर क्षेत्र में अवकाशग्रहण करने की सीमा निर्धारित होनी चाहिए. इसका सीधा संबंध व्यक्ति की शारीरिक और मानसिक क्षमता से होता है. एक उम्र के बाद व्यक्ति में शारीरिक और मानसिक फुर्ती नहीं रहती. अटल बिहारी वाजपेयी को ही लें, विदेशी नेताओं और पत्रकारों से बातचीत में उत्तर देने में उन्हें बड़ी देर लगती है और यह देरी बढ़ती जा रही है जिससे हास्यास्पद स्थिति उत्पन्न हो रही है. इसे अगर राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ कर देखें तो निर्णय लेने में देरी एक खतरनाक स्थिति है. दुर्भाग्यवश नेताओं में इसे लेकर वैसी चिंता नहीं है कि इसका क्या परिणाम हो सकता है और हम इसे बर्दाश्त करे जाते हैं. इस पर विचार नहीं किया जाता कि हमारी योजनाओं और राष्ट्रीय निर्णय को यह कैसे प्रभावित करता है. जब कोई नेता स्वयं 70 साल से ऊपर का होता है तो उसके नीचे अनेक पीढ़ियाँ होती हैं. इसमें 60, 45 और 25 साल की पीढ़ी होती है जो कुछ समय बाद हताश हो जाती है. उनकी दिलचस्पी निर्णय लेने और देश को आगे बढ़ाने में नहीं रहती. वामपंथी नेताओं जैसे ज्योति बसु को देखें. अब भी उनका जुझारूपन बरक़रार है लेकिन सक्रिय राजनीति से हटना चाहते हैं. मुझे कवि टेनिसन की पंक्ति याद आती है- एक अच्छी चीज को भी टिके रहने का अधिकार नहीं है, बहुत से लोग राजनीति में इसलिए आते हैं कि इसमें रिटायर होने की कोई उम्र नहीं होती. दरअसल सत्ता का स्वाद नहीं जाता. मैं इसे 'दशरथ सिन्ड्रोम' कहता हूँ. यही वजह थी कि कैकयी ने सत्ता के सूत्र हाथ में ले लिए थे. अगर दशरथ पहले रिटायर हो जाते तो ऐसी स्थिति न आती. वाजपेयी सबको रिटायर होने की सलाह दे रहे हैं लेकिन अपने बारे में मौन है. मुझे नागार्जुन की पंक्ति याद आती है- दादाजी अब आप रिटायर हों. (आशुतोष चतुर्वेदी से बातचीत पर आधारित) |
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