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क्या असर होगा वीज़ा विवाद का? | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
गुजरात के भाजपा मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का अमरीका की ओर से पर्यटक और व्यवसायिक वीज़ा रद्द होना और भारत सरकार की इस पर तीखी प्रतिक्रिया पर पर्यवेक्षकों का क्या मानना है? वर्ष 2002 में गुजरात में हुए दंगों के संदर्भ में अमरीका ने मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी पर धार्मिक स्वतंत्रता के हनन का आरोप लगाया है. जहाँ भारत की केंद्र सरकार ने भी इस मामले पर चिंता और अफ़सोस जताते हुए अपनी आपत्ति दर्ज कराई है वहीं नरेंद्र मोदी ने इस फ़ैसले को भारतीय संविधान, प्रभुसत्ता और पाँच करोड़ गुजरातियों का अपमान बताया है. अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार प्रोफेसर पुष्पेश पंत का कहना था कि इस घटनाक्रम से भारत-अमरीका के कूटनीतिक रिश्तों पर असर पड़ा है और ये नासमझी का फ़ैसला है उनका कहना था, "ये बात नरेंद्र मोदी व्यक्ति की नहीं है. अमरीका की कुटिल चाल ये है कि भारत के मुसलमानों को यह एहसास दिलाया जाए कि उनके हितों का रखवाला कोई धर्मनिरपेक्ष स्वतंत्र सरकार नहीं बल्कि सीमा के पार बैठा अमरीका है. ये भारत की संप्रभुता को अक्षय करने का एक प्रयत्न है और साथ ही भारत के अल्पसंख्यकों के अलगाव को बढ़ाने की कोशिश है. साथ ही उन्होंने कहा कि इस घटना को हाल में अमरीकी विदेश मंत्री कोंडोलीज़ा राइस के ईरान-भारत गैस पाइपलाइन के बारे में जताई आपत्ति के साथ जोड़कर देखा जाना चाहिए. उधर अमरीका के जॉर्जिया विश्विद्यालय में एशिया प्रोग्राम के निदेशक और बुश प्रशासन के सलाहकार प्रोफेसर अनुपम श्रीवास्तव का कहना था, "मोदी का ये निजी दौरा था और चाहे मोदी के ख़िलाफ़ क़ानूनी तौर पर दंगे भड़काने के मामले में सबूत नहीं आया है लेकिन अमरीका मानवाधिकारों के मामले पर बहुत संवेदनशील है." उनका कहना था कि उन पर दंगों में हाथ होने के लगातार आरोप लगते रहे हैं और ये भी साबित नहीं हुआ है कि वे इन आरोपों से बरी हो गए हों. लेकिन प्रोफ़ेसर पुष्पेश पंत ने इसे विचित्र तर्क बताया और कहा कि क़ानून की नज़र में तो जब तक जुर्म साबित न हो तब तक कोई भी व्यक्ति निर्दोष ही समझा जाता है. उनका ये भी कहना था कि दुनिया में 'आतंकवाद के ख़िलाफ़ चल रही लड़ाई' के कारण अमरीकी सरकार मुसलमानों की भावनाओं के प्रति संवेदनशील है और नहीं समझती की मोदी का इस समय अमरीका आना उचित होगा. प्रोफ़ेसर अनुपम श्रीवास्तव का मानना था कि भारत की आपत्ति के बावजूद अमरीकी प्रशासन के इस फ़ैसले को बदलने के आसार कम हैं. उनका तर्क है कि केंद्र में पिछली भाजपा सरकार के कार्यकाल के दौरान भी अमरीकी कांग्रेस सदस्यों और विदेश मंत्रालय को भी उसके साथ कई दिक़्क़तें पेश आई थीं. प्रोफ़ेसर अनुपम श्रीवास्तव के अनुसार इन मुश्किलों में मुसलमानों के ख़िलाफ़ हुए दंगों में नरेंद्र मोदी का कथित हाथ होना, मध्यप्रदेश में इसाइयों का धर्मपरिवर्तन, भारत में हिंदू-मुस्लिम रिश्तों में तनाव से अमरीकी आतंकवाद विरोधी अभियान में दिक्कतें और अमरीका में भारत-अमरीका गुटों का दबाव प्रमुख हैं. उनका कहना था कि भारत सरकार को पहले ही देखना चाहिए था यदि कोई व्यक्ति निजी तौर पर जा रहा है तो इस पर कूटनीतिक दख़ल नहीं होना चाहिए. |
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