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शनिवार, 05 मार्च, 2005 को 19:41 GMT तक के समाचार
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सरहद लाँघने का सालों पुराना सुहाना सपना

ख़ुर्शीद
1948 तक ख़ुर्शीद मुज़्ज़फ़राबाद के पास अपने पति प्रताप सिंह के साथ रहती थीं
एक वृद्ध कश्मीरी महिला जिनके दो धर्म, दो पति और दो देश रहे हैं, पिछले कई साल से अपने बिछड़े हुए सिख भाई और रिश्तेदारों से मिलने का बेताबी से इंतज़ार कर रही हैं.

ख़ुर्शीद बीबी 73 साल की हैं और बेहद असामान्य परिस्थितियों में भारत-पाकिस्तान के बंटवारे के समय अपने सिख पति और ख़ानदान से बिछड़ गई थीं.

उन हालात की वजह से ही आज ख़ुर्शीद बीबी के ख़ानदान के लोग दूसरे धर्म से संबंध रखते हैं और अलग-अलग देशों में रहते हैं.

ख़ुर्शीद बीबी आज पाकिस्तान के सूबा सरहद के गढ़ी हबीबुल्लाह में अपने बच्चों, नवासों और नवासियों के साथ एक ख़बसूरत घर में रहती हैं और उनकी कहानी शुरु होती है देश के बटंवारे के समय.

ख़ुर्शीद बीबी के ही शब्दों में: "मेरा नाम ज्ञान कौर था और मेरा संबंध सिख घर्म से था. मैं वर्ष 1948 तक मुज़्ज़फ़राबाद से 16 किलोमीटर दूर बसे पठकाह गाँव में अपने पति प्रताप सिंह के साथ रहती थी."

 मैं जान बचाकर भागती हुई अपने पति की तलाश में हैरान-परेशान थी कि मेरी कलाई अचानक एक व्यक्ति ने पकड़ ली, मैंने कलाई छुड़ाने की कोशिश की मगर नाकाम रही और वह व्यक्ति मुझे अपने घर गढ़ी हबीबुल्लाह ले आया

वे बताती हैं कि देश के बंटवारे के फ़ौरन बाद कश्मीर के शासक महराजा हरि सिंह की हुकूमत के ख़िलाफ़ बग़ावत शुरू हो गई जिसके कारण मुसलमानों, हिंदुओ और सिखों के बीच तनाव पैदा हो गया.

ख़ुर्शीद बीबी कहती है कि बँटवारे से पहले सब लोग भाईचारे से रहते थे. लेकिन तनाव की वजह से बहुत सारे हिंदू और सिख अपने घर छोड़कर चले गए और उनमें ख़ुर्शीद की माँ, बहन और भाई भी थे.

लेकिन ख़ुर्शीद अपने पति के साथ गाँव में ही रहीं और उनके पिता मदन सिंह और दूसरे ख़ानदान वालों ने भी गाँव नहीं छोड़ा, उनके पिता गाँव के नंबरदार थे.

उस दौरान अक्तूबर 1948 में पाकिस्तान के सूबा सरहद से कश्मीरी मुस्लमानों की मदद के लिए क़बायली आ गए और उन्होंने सिखों और हिंदुओं को निशाना बनाया.

ख़ुर्शीद का कहना है कि उन्होंने सुन रखा था कि क़बायली आने वाले हैं. उन हालात में एक बार फिर बहुत से सिख और हिंदू अपना घर छोड़कर जम्मू-कश्मीर राज्य सहित भारत के अन्य इलाक़ों में चले गए.

फिर जब दंगे भड़के और हंगामा हुआ तो कई सिख और हिन्दू मारे गए.

ख़ुर्शीद का कहना है कि हालंकि उनके ज़्यादातर रिश्तेदार गाँव छोड़ चुके थे लेकिन वे और उनके पति पठकाह ही में रहे. अक्तूबर की एक सुबह जब क़बायलियों ने उनके गाँव के क़रीब से गुज़रने वाली सड़क पर अचानक गोलियां चलाईं तो कोई और चारा न नज़र आया और ख़र्शीद, उनके पति प्रताप सिंह और चंद दूसरे सिख परिवारों ने गाँव छोड़ दिया.

 मुझे क़िस्मत ने ज्ञान कौर से ख़ुर्शीद बीबी बना दिया, दो माह बाद मेरी शादी ख़ानी ज़मान से हो गई, ख़ानी ज़मान से मेरे पाँच बेटे और एक बेटी हुई. सन 1993 में ख़ानी ज़मान की मृत्यु हो गई

ख़ुर्शीद का कहना है कि जब वे लोग मुज़फ़्फ़राबाद शहर के क़रीब पहुँचे तो अचानक चारों तरफ से गोलियां बरसना शुरू हो गईं और अफ़रा-तफ़री मच गई.

उस अफ़रा-तफ़री के बीच उनके पति ख़ुर्शीद से बिछड़ गए.

ख़ुर्शीद का कहना है कि उन्हें आज तक नहीं पता कि प्रताप सिंह, साथ ही बहने वाली नदी किशनगंगा या नीलम नदी में बह गए या क़बायलियों की गोली का निशाना बन गए?

वे कहते हैं कि उन्हें मालूम नहीं कि उस हादसे में कितने लोग गोलियों के शिकार बने, कितने नदी में डूब गए और जो बच गए उनके साथ बाद में क्या हुआ?

ख़ुर्शीद कहती हैं, "मैं जान बचाकर भागती हुई अपने पति की तलाश में हैरान-परेशान थी कि मेरी कलाई अचानक एक व्यक्ति ने पकड़ ली. मैंने कलाई छुड़ाने की कोशिश की मगर नाकाम रही और वह व्यक्ति मुझे अपने घर गढ़ी हबीबुल्लाह ले आया. उसका नाम ख़ानी ज़मान था."

 मैं बीमार रहती हूँ और ज़िंदगी का कोई भरोसा नहीं, न जाने कब यह चिराग़ बुझ जाए बस अल्लाह करे कि अपने भाई से ज़िदगी में एक बार मुलाक़ात हो जाए. मैं पाकिस्तान के सदर और हिंदुस्तान के प्रधानमंत्री से अपील करती हूँ कि वह बँटे हुए ख़ानदानों को एक दूसरे से मिलने दें

वे कहती हैं, "मेरे पिता, बहन और भाई पहले ही घर छोड़ कर चले गए थे. पति के बारे में यही विचार था कि वे मारे गए. बाद में मालूम हुआ कि मेरे पिता भी गांव में क़बायलियों के हाथों मारे गए. घर जला दिया गया. मैं अकेली रह गई थी और ख़ानी ज़मान के घर पहुँच कर कुछ ही दिनों बाद मैं अपनी मर्ज़ी से मुसलमान हो गई."

उनका कहना है, "मुझे क़िस्मत ने 23 साल बाद ज्ञान कौर से खुर्शीद बीबी बना दिया. दो माह बाद मेरी शादी ख़ानी ज़मान से हो गई. ख़ानी ज़मान से मेरे पाँच बेटे और एक बेटी हुए. सन 1993 में ख़ानी ज़मान की मृत्यु हो गई."

ख़ुर्शीद बीबी बताती हैं, "मुझे इस घर में कभी किसी ने कोई तकलीफ़ नही पहुंचाई. मैं आज तक आराम से हूँ. मेरे पति का मुझसे बहुत अच्छा सुलूक़ रहा और ससुराल और बिरादरी वाले भी मुझसे बहुत अच्छे रहे लेकिन अपनों से बिछड़ने का दुख मुझे हमेशा सताता है."

उनका कहना है, "मुझे बरसों तक अपने भाई-बहन और पिता के बारे में कोई जानकारी नहीं थी जो 1947 के हंगामों में मुझसे बिछड़ गये थे. हालाँकि मैंने हालात से समझौता कर लिया था लेकिन मैंने अपने बिछड़े हुओं कि तलाश भी जारी रखी."

सन 1975 में उनकी ख़ामोश यादों की चिंगारियां उस वक़्त भड़क उठीं जब उन्हें एक रिश्तेदार के ज़रिए अपने भाई पंजाब सिंह के बारे में पता चला. वे भारत के देहरादून शहर में हैं.

उनका कहना है कि उन्होंने भाई का पता हासिल किया और उन्हें ख़त लिखा और इसके साथ ही भाई-बहन के बीच पत्रों और तस्वीरें भेजने का सिलसिला शुरू हुआ.

ख़ुर्शीद कहती हैं, "जब मुझे भाई की तरफ़ से पहला ख़त मिला तो मेरी ख़ुशी की कोई सीमा नहीं थी. मैं जुदाई के ग़म और खुशी में रो रही थी. मुझे भाई से मालूम हुआ कि मेरे पिता और बहन अब इस दुनिया में नहीं हैं. मेरी बहन की बेटी और उनके बच्चे हैं."

बारह साल पहले बहन और भाई का टेलीफ़ोन पर पहली बार संपर्क हुआ और दोनो ने लंबे समय के बाद एक दूसरे की आवाज़ सुनी.

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