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विभाजन के घाव पर मिलन का मरहम
दो देशों, दो धर्मों और दो पतियों के बीच बँटी सतहत्तर वर्षीय महिला का सपना आख़िरकार पूरा हो गया है. भारत से पाकिस्तान पहुँची हरबंस कौर ने कहा, "मैं मरने से पहले एक बार अपने परिवार से मिलना चाहती थी, मेरी इच्छा पूरी हो गई." अहमदाबाद से चलकर पाकिस्तान पहुँची हरबंस कौर सिख हैं और पाकिस्तान में रहने वाले उनके बेटे-बेटी मुसलमान हैं. वे अपनी औलादों से चालीस वर्ष के बाद मिल रही हैं. लंबी कहानी हरबंस कौर की कहानी भारत के विभाजन के समय शुरू हुई, वे उन दिनों अपने सिख पति के साथ पाकिस्तानी कश्मीर में मुज़फ़्फराबाद शहर के पास रहती थीं. जब तनाव बहुत बढ़ा तो उनके पति कश्मीर छोड़कर पंजाब चले गए लेकिन वे वहीं रह गईं.
जब काफ़ी समय तक उनके पति की खोज-खबर नहीं मिली तो उन्होंने हिदायतुल्ला नाम के एक स्थानीय मुसलमान से शादी कर ली और इस्लाम क़ुबूल कर लिया. मुज़फ़्फ़राबाद में ही उनकी दो संतानें हुईं--मंज़ूर हुसैन और ज़ीनत बीबी. कई वर्ष बाद 1950 के दशक में भारत और पाकिस्तान के बीच एक समझौता हुआ कि दोनों देशों की महिलाओं को उनके परिवारों को लौटा दिया जाए. वे मंज़ूर और ज़ीनत को छोड़कर अपने परिवार और पहले पति से मिलने भारत पहुँचीं जहाँ वे पाकिस्तानी कश्मीर नहीं लौट सकीं. उन्होंने अपने पहले पति से दोबारा शादी कर ली और सिख धर्म भी अपना लिया, इस शादी के बाद उनके तीन और बच्चे हुए. फ़ोन से बात बनी कई वर्षों तक दोनों परिवारों को एक-दूसरे का पता नहीं था, अचानक एक रिश्तेदार के ज़रिए ज़ीनत बीबी को पता चला कि उनकी माँ भारत में जीवित हैं. इसके बाद किसी तरह उन्हें हरबंस कौर का फ़ोन नंबर मिल गया और दोनों परिवारों के बीच संपर्क का सिलसिला शुरू हुआ. दोनों परिवार एक दूसरे से मिलना चाहते थे लेकिन भारत-पाकिस्तान तनाव के कारण उनका मिलना टलता रहा. आख़िरकार हरबंस कौर पिछले सप्ताह अपने सिख बेटे और बहू के साथ पाकिस्तान पहुँचीं, जहाँ वाघा सीमा पर उनके मुस्लिम बेटी-बेटे और परिवार के अन्य सदस्यों ने उनका स्वागत किया. हरबंस कौर का कहना है कि इतने वर्षों बाद अपने बेटों-बेटियों और नाती-पोतों को देखकर वे इतनी ख़ुश हैं कि बयान नहीं कर सकतीं. परिवार एक हुआ, हरबंस कौर की सबसे मुलाक़ात हुई लेकिन वे अपने मुस्लिम पति से नहीं मिल सकीं जिनकी मौत हरबंस के भारत जाने के दो वर्ष बाद ही हो गई थी. |
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