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विश्व रिकार्ड ने बचाई हज़ारों की जान | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
तमिलनाडु के एक गांव ने विश्व रिकार्ड बनाने के लिए तीन साल पहले जो हज़ारों पेड़ लगाए थे उन्हीं पेड़ों ने सूनामी के दौरान उनकी जान बचा ली. वेदराणायम जिले के नालूवेदपती गांव के लोगों ने जब 2002 में विश्व रिकार्ड बनाने के लिए 80,244 पौधे लगाए थे तो उन्हें अंदाज़ा नहीं था कि ये पेड़ उनकी जान बचाएंगे. 26 दिसंबर को जब सूनामी की लहरें इस गांव से टकराईं सारे इलाक़े पर बुरा प्रभाव पड़ा सिर्फ इस गांव को छोड़कर. छोटा सा जंगल तमिलनाडु के अन्य तटीय इलाक़ों से इतर नालूवेदपती गांव चारों ओर से जंगलों से घिरा हुआ है. लोगों ने नारियल और कई अन्य किस्मों के जो 80 हज़ार से अधिक पेड़ लगाए हैं उससे पूरा इलाक़े में छोटा मोटा जंगल ही बन गया है. इस क्षेत्र में आने पर समुद्र तट खोजने के लिए इस जंगल को पार करना पड़ता है जो अपनेआप में अनोखा अनुभव है.
इस गांव में 600 घर हैं. सूनामी में जहां 10 हज़ार से अधिक लोगों की मौत हो गई वहीं इस तटीय गांव में कुछेक लोगों को मामूली चोटें लगीं और कुछेक घरों को नुकसान पहुंचा. सूनामी लहरें इन जंगलों में उलझ कर रुक गयीं. गांव के किसान नगप्पन कहते हैं कि इस क्षेत्र में हमेशा से काफी पेड़ लगे रहे हैं लेकिन दो साल पहले स्थानीय प्रशासन ने विश्व रिकार्ड की बात की तो फिर हज़ारों पेड़ लगाए गए. वो कहते हैं " हमें तो सिर्फ इन पेड़ों ने बचाया है. सभी तटीय गांवों में पेड़ लगाने चाहिए. मैं यही कह सकता हूं. " सत्तर साल के मारिमाथू 26 दिसंबर की घटना को याद करके कांप उठते हैं. वो कहते हैं " मैं ऊंचे टीले पर था. ऊंची ऊंची लहरें आ रही थी और चारों तरफ पानी भर गया था. " मारिमाथू बताते हैं कि उनके पुरखे भी यहां हमेशा से पेड़ लगाते रहे हैं और इस बार तो इन पेड़ों की महत्ता बिल्कुल स्पष्ट हो गई है. |
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