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गंगासागर:सूनामी पर आस्था की जीत | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
कहा जाता है कि ‘सारे तीरथ बार-बार, गंगासागर एक बार.’ इस बार भी शुरू होने के पहले से ही सूनामी की तबाही से सिहरते इस मेले में आख़िरकार आस्था का पलड़ा ही भारी रहा. मकर संक्रांति के मौक़े पर यहाँ गंगा में डुबकी लगाने वालों की संख्या तीन लाख तक पहुंच गई. हालाँकि मेले के पहले दिन यानी 12 जनवरी को जो स्थिति थी उससे तो प्रशासन को एक लाख लोगों के भी आने की उम्मीद नहीं थी. दक्षिण 24-परगना के ज़िलाधाकारी विवेक कुमार ने भी माना कि ‘सूनामी का आतंक इसकी एक प्रमुख वजह रही.’ ज़िला परिषद के सभापति विमल मिस्त्री भी इससे सहमत थे. शुक्रवार को ज़िला प्रशासन ने माना कि सूनामी का डर कुछ हद तक ख़त्म हो जाने की वजह से ही मेले में लगभग तीन लाख लोग पहुंच पाए. बिहार के बेगुसराय से मेले में पहुँचे अवधेश राय ने कहा, "सूनामी का डर तो था ही, लेकिन फिर भी भगवान पर भरोसा रख कर वे ठीक स्नान के मौक़े पर यहाँ पहुँच गए." अवधेश राय कहते हैं, "सूनामी का डर नहीं होता तो शायद उनके गाँव से सौ-डेढ़ सौ और लोग आते." वैसे बीते साल यहाँ चार लाख से ज़्यादा तीर्थयात्री पहुँचे थे. कोलकाता में हुगली नदी जल पथ परिवहन समन्वय समिति यात्रियों को गंगासागर लाने-ले जाने के लिए जहाज़ चलाती है. इस समिति के एक अधिकारी कहते हैं, "भीड़ कम होने के कारण कुछ सेवाएं बंद करनी पड़ीं. बीते 15 वर्षों में ऐसा पहली बार हुआ." अनुमान और आस्था सूनामी की तबाही से पहले ज़िला प्रशासन को इस साल तीर्थयात्रियों की संख्या पाँच लाख से ज़्यादा होने का अनुमान था. प्रशासन ने अपने स्तर पर तमाम तैयारियाँ भी की थीं. समुद्र की लहरों की निगरानी के लिए देहरादून से ऐसे उपकरण मंगाए गए जिनसे रात के अंधेरे में भी देखा जा सकता है. इसके अलावा कोस्टगार्ड के दो जहाज़ भी तैनात किए गए थे.
तीर्थयात्रियों की संख्या कम होने व मेले में कम समय बिताने का असर हर साल दुकान लगाने वालों पर पड़ा है. यहाँ शंख व सीप से बनी वस्तुओं की दुकान लगाने वाले दुलाल चौधुरी कहते हैं, "बीते साल बिक्री काफी अच्छी थी लेकिन इस साल तो लागत की भरपाई भी मुश्किल ही लगती है." सभी दुकानदारों की स्थिति कमोबेश यही है. मेले में भीड़ उमड़ी संक्रांति के स्नान से एक दिन पहले यानी गुरुवार की रात को. उससे पहले तो उजाड़ ही नजर आ रहा था. इससे साफ़ है कि लोग इस द्वीप पर कम से कम समय बिताना चाहते थे. उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर ज़िले से आए रामलगन सिंह कहते हैं, "जितनी देर यहाँ रहेंगे, ख़तरा उतना ही ज़्यादा रहेगा." रामलगन सिंह कहते हैं कि जान बची रहे तो पुण्य कमाने के कई मौक़े मिलेंगे. इसलिए वह इस बार अकेले ही मेले में आए थे. परिवार को अगले साल लाएंगे. |
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