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शुक्रवार, 28 जनवरी, 2005 को 05:38 GMT तक के समाचार
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लालू को चुनौती देना वाला कोई है?

लालू यादव
बहुत ही चतुर नेता साबित हुए हैं लालू
कौन आएगा इनके सामने? कोई है? पिछले 15 वर्षों में बिहार में शायद ही कोई चुनाव हुआ हो जिसमें कहीं न कहीं से लालू यादव की राजनीतिक मौत का ऐलान नहीं हुआ. लेकिन परिणाम आने की देर थी और मौत का डंका पीटने वाले दुम दबाए न जाने कहाँ लुप्त हो गए.

हर चुनावी अभियान का सबसे बड़ा नारा रहा "लालू हटाओ", हर चुनाव में जीते लालू.

हर चुनाव के पहले कहा गया बिहार कराह रहा है लालू राज में, बिहार को जीना है तो लालू को हटाना होगा. हर चुनाव के बाद लालू के विरोधी ही कराहते मिले.

बिहार और उसकी जनता की बात छोड़िए-उनको कौन पूछता है? उनको किसने कब पूछा है कि बिहार ही बदहाली का सारा भार लालू के मत्थे ही जड़ दिया जाए.

लालू यादव के आने से पहले बिहार किसी स्वर्ण युग में तो नहीं था. चरमरा चुका था चालीस साल कांग्रेसी राज के मंद-मंद कहर से. भागलपुर जेल कांड लालू ने नहीं करवाया. भागलपुर के दंगे लालू ने नहीं करवाए. अरवल में निहत्थे हरिजनों का संहार लालू ने नहीं करवाया. बेबी हत्याकांड लालू ने नहीं करवाया. बिहार के पिछड़ों का सदियों से चला आ रहा सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और व्यक्तिगत शोषण लालू ने नहीं करवाया. ये मानना कि लालू के आने के पहले बिहार में सबकुछ कुशलमंगल था कुछ लोगों द्वारा रची गई मिथ्या है.

लेकिन यह सब कहने का मतलब ते कतई नहीं हो सकता कि बिहार की मौजूदा स्थिति में लालू यादव और उनके द्वारा जमाए गए तंत्र का कोई हाथ नहीं. 15 वर्ष कोई काम करने के लिए बहुत वक्त होता है. 15 वर्षों में लालू बहुत कुछ कर सकते थे. इस समय में उन्होंने अपने और और अपनी राजनीति के लिए तो बहुत कुछ किया, बिहार के लिए शायद ही कुछ. बल्कि कहना ठीक होगा कि बिहार जिस ढलान पर था उसी पर राज्य को और अग्रसर कर दिया.

ससुरालवाद

बहुत आशाएँ लेकर आए थे लालू 1980 में, कर्पूरी ठाकुर के सपनों के बिहार को साकार करने के लिए. साकार हुआ तो सिर्फ़ लालू का वर्चस्व. साकार हुई तो उनकी सत्ता लिप्सा. साकार हुई तो उनके इर्द-गिर्द चिपके लोगों की आर्थिक उन्नति. साकार हुआ तो उनका ससुरालवाद.

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लालू पर ससुरालवाद चलाने का आरोप है

लालू के बड़े भाई, जो उन्हें गोपालगंज के फुलवरिया गाँव से बचपन में पढ़ाने लिखाने पटना लाए थे. आज भी सरकारी क्लर्क के एक छोटे क्वार्टर में रहते हैं. लालू के दोनों साले-सुभाष और साधू- विधायकों के तौर पर पटना के बड़े-बड़े बंगले हथियाए बैठे हैं.

बिहार हमेशा की तरह कराह रहा है. अब शायद थोड़ा और निरीह हो चुका है क्योंकि 15 सालों की प्रताड़ना और जो जुड़ गई है.

अगर इतना ही बुरा हाल है बिहार का तो क्यों नहीं उखाड़ फेंकती लालू को राज्य की जनता?

वही सवालः कौन आएगा इनके सामने? कोई है?

कूटनीति

मेरी समझ से राजनीति और कूटनीति में लालू यादव का आज देश भर में कोई सानी नहीं.

लालू के करिश्मा की बात अक्सर की जाती है. सही है. उनके जैसा उत्तेजक, हाज़िर जवाब, मनोरंजक नेता शायद देश के राजनीतिक पटल पर नहीं है. लेकिन लालू की असल शक्ति है उनकी कूटनीति. उनका समय की नब्ज़ पहचानने वाला ज़मीनी तेज. राजनीतिक गणित पर उनकी पकड़. सत्ता की ज़रूरतों की उनकी सूक्ष्म समझ.

बिहार के चुनावी आंकड़ों को देखिए. गौर किया जाए तो लालू ने एक चुनाव में मात खाई है- 1988 का लोकसभा चुनाव जब एनडीए के सब घटक एक होकर उनके राजग के खिलाफ चुनाव लड़े थे. चंद महीने बाद ही 2000 में विधानसभा चुनाव हुए. एनडीए के घटक तब तक बिखर चुके थे मुख्यमंत्री कौन बनेगा के सवाल पर. लालू फिर जीते.

 लालू की असल शक्ति है उनकी कूटनीति. उनका समय की नब्ज़ पहचानने वाला ज़मीनी तेज. राजनीतिक गणित पर उनकी पकड़. सत्ता की ज़रूरतों की उनकी सूक्ष्म समझ.

बिहार में शायद ही कोई पार्टी है जिसको पिछले 15 वर्षों में लालू ने तोड़ा नहीं-इसमें बिहार की सीपीआई की इकाई तक की गिनती है. विपक्ष में जब तक टूट-फूट रहेगी, लालू की गद्दी- या फिर राबड़ी देवी की- सुरक्षित है. और यही लालू की बड़ी उपलब्धि रही है.

वोट बैंक

लालू का एक ठोस वोट बैंक है. पिछड़ों को, खासकर बिहार के यादव समुदाय को, और कुछ मिला हो या नहीं, एक नए सामाजिक सम्मान और राजनीतिक सबलता का एहसास तो मिला ही है.

यादवों के साथ जुड़े हैं बिहार के मुसलमान जिन्हें लालू राज में पूर्ण सुरक्षा और संरक्षण मिला. यह कोई मामूली उपलब्धि नहीं. ऐसे समय जब भाजपा की अयोध्या मुहिम ने देश भर में दंगे करवाए, ऐसे समय जब भाजपा सत्ता में रही और जगह-जगह अल्पसंख्यकों पर हमले हुए, ऐसे समय पर जब नरेन्द्र मोदी राज में गुजरात में मुसलमानों का संहार हुए, बिहार ऐसा प्रदेश बना रहा जहाँ मुसलमानों ने अपने आप को सुरक्षित महसूस किया, पाया कि कोई है जो उनपर हमलों की छूट नहीं देगा, जो आडवाणी के रथ को रोक देगा, जो अशोक सिंघल और प्रवीण तोगड़िया सरीके विष उगलने वालों को बिहार में घुसने की इजाज़त नहीं देगा

कमियाँ

लेकिन लालू यादव में भारी कमियाँ भी हैं. हाल तक वे विकास शब्द मात्र से चिढ़ते थे. प्रशासनिक मामलों से मुख्यमंत्री तौर पर भी उन्होंने खास मतलब नहीं रखा. बिहार की अराजकता को राजनीतिक रंग देने और उसका राजनीतिक लाभ उठाने के सिवाए कुछ नहीं किया.

 पिछड़ों को, खासकर बिहार के यादव समुदाय को, और कुछ मिला हो या नहीं, एक नए सामाजिक सम्मान और राजनीतिक सबलता का एहसास तो मिला ही है. यादवों के साथ जुड़े हैं बिहार के मुसलमान जिन्हें लालू राज में पूर्ण सुरक्षा और संरक्षण मिला.

भ्रष्टाचार हमेशा की तरह लालू राज में भी पनपा और बढ़ा. राजकीय खज़ाना लुटा, कुछ लोग अमीर हुए. लालू यादव न होते तो बिहार का यह हाल होता? कहना कठिन है. लालू न करते तो शायद कोई और करता. आज जो बिहार के मुख्यमंत्री पद के दावेदार बने हैं-राम विलास पासवान और नीतीश कुमार - लालू यादव से किस लिहाज़ से बेहतर हैं इसका जायज़ा लेना बहुत ज़रूरी है. पासवान और नीतीश के इर्द-गिर्द किस तरह के तत्व हैं इस बात पर गौर करने की जरूरत है.

बहरहाल, लालू का एक वोट बैंक है जो सशक्त रूप से उनके पीछे है, जिसको विकास और उससे जुड़े मुद्दों की उतनी फ़िक्र नहीं जितनी कि शहरों में रहने वाले लोगों, अगड़ी जाति के लोगों और मीडिया को है.

राजनीतिक और चुनावी गणित में यह वोट बैंक सबसे धनी है- क्योंकि लालू के विपक्षी अभी भी बिखरे हुए हैं. कोई है?

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