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चुनाव आयोग नकारात्मक वोट के पक्ष में | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत का चुनाव आयोग चाहता है कि लोकसभा और विधानसभा चुनाव में नकारात्मक वोट का प्रावधान करना चाहिए. आयोग ने इसके लिए क़ानून में आवश्यक सुधार की भी अनुशंसा की है. 'नकारात्मक वोट' का मतलब है मतदाता को यह अधिकार देना कि वह अपना मत डालते हुए यह कह सके कि उसकी राय में कोई भी उम्मीदवार वोट पाने के योग्य नहीं है. यानी हर मतदान पत्र में एक कॉलम इस 'नकारात्मक वोट' का भी होगा. पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज़ (पीयूसीएल) ने सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर करके 'नकारात्मक वोट' का अधिकार देने की मांग की है. इस याचिका पर अपना पक्ष रखते हुए चुनाव आयोग के वकील एस मुरलीधर ने मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति आरसी लाहोटी और न्यायमूर्ति जीपी माथुर की दो सदस्यों वाली खंडपीठ के सामने कहा, "चुनाव आयोग याचिकाकर्ता से पूरी तरह सहमत है." याचिकाकर्ता ने कहा है कि चुनाव परिणाम के साथ यह भी ज़ाहिर किया जाना चाहिए कि कितने लोगों ने 'नकारात्मक वोट' डाले. पीयूसीएल के वकील ने कहा कि अभी यह प्रावधान है कि जो अपना वोट न डालना चाहे उसे चुनाव अधिकारी को बताना होता है कि वह वोट न डालने के अपने अधिकार का उपयोग करना चाहता है. इसके बाद उसका नाम पता दर्ज किया जाता है.
पीयूसीएल का तर्क था कि इससे चुनाव की गोपनीयता का उल्लंघन होता है इसलिए मतदाता का नाम ज़ाहिर नहीं होना चाहिए. उल्लेखनीय है कि चुनाव आयोग 2001 और 2004 में दो बार केंद्र सरकार को यह लिख चुका है कि जनप्रतिनिधित्व क़ानून में संशोधन किया जाना चाहिए. चुनाव आयोग ने कहा है कि उससे कई व्यक्तियों और संस्थाओं ने इसकी मांग की है. सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र के महाधिवक्ता को नोटिस जारी करते हुए इस मामले की सुनवाई के लिए चार हफ़्ते बाद की तारीख़ तय की है. |
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