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फ़ोरेन्सिक विशेषज्ञों से पूछताछ हुई | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
गुजरात के गोधरा में फ़रवरी 2002 में हुई रेल आगज़नी घटना की जाँच करने वाले दो फ़ोरेन्सिक विशेषज्ञों की पेशी गुजरात दंगों की जाँच कर रहे नानावती आयोग के सामने हुई है. ग़ौरतलब है कि नानावती आयोग उन सांप्रदायिक दंगों की जाँच कर रहा है जो गोधरा रेल आगज़नी घटना के बाद गुजरात में भड़क उठे थे. उन दंगों में सरकारी आँकड़ों के मुताबिक एक हज़ार लोग मारे गए थे, हालाँकि ग़ैरसरकारी आँकड़ों के मुताबिक मृतकों की संख्या तीन हज़ार से ज़्यादा थी. गुजरात फ़ोरेन्सिक प्रयोगशाला के दो विशेषज्ञों एमएन जोशी और एसजी खंडेलवाल ने साबरमती रेलगाड़ी के उस एस-6 डिब्बे की फ़ोरेन्सिक जाँच की थी जिसमें आग लगी थी. उसमें आग लगने से 59 लोग मारे गए थे. सांप्रदायिक दंगों के प्रभावितों का प्रतिनिधित्व कर रहे वकील मुकुल सिन्हा ने नानावती आयोग के सामने इन दोनों फ़ोरेन्सिक विशेषज्ञों से पूछताछ की. मुकुल सिन्हा ने पत्रकारों को बताया कि इन दो विशेषज्ञों से पूछताछ से कुछ ऐसे तथ्य सामने आए हैं जिनसे यह साबित होता है कि एस-6 डिब्बे की फ़ोरेन्सिक जाँच में कुछ गड़बड़ी हुई थी. मुकुल सिन्हा ने बताया कि फ़ोरेन्सिक विशेषज्ञों ने एस-6 और एस-7 डिब्बों के बीच संबंध बनाने वाली जली हुई दरी को संभालकर नहीं रखा जोकि एक महत्वपूर्ण सबूत था. सिन्हा का कहना था कि उस जले हुए टुकड़े से यह पता चल सकता था कि आग आख़िर कैसे लगी. वकील ने यह भी बताया कि पूछताछ से पता चला कि डिब्बे की फ़ोरेन्सिक जाँच कई दिन बाद की गई और ऐसी पूरी संभावना है कि इन दिनों में महत्वपूर्ण सबूत नष्ट हो गए होंगे. ग़ौरतलब है कि पिछले साल रेल मंत्रालय ने गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस में आग कैसे लगी, इसकी जाँच के लिए जो यूसी बैनर्जी समिति गठित की थी, उसने इसी सप्ताह अपनी अंतरिम रिपोर्ट दी है जिसमें कहा गया है कि आग रेल के अंदर से लगाई गई लगती है, न कि बाहर से. अभी तक कहा गया था कि एस-6 डिब्बे में एक क्रुद्ध भीड़ ने बाहर से आग लगाई थी जिसमें 59 लोग मारे गए थे. बैनर्जी समिति ने पश्चिम रेलवे को इस घटना की समुचित जाँच नहीं करने के लिए भी आड़े हाथों लिया है. |
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