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आग बाहर से नहीं लगाई गई: समिति | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
गोधरा रेल कांड की जाँच कर रही जस्टिस उमेश चंद्र बैनर्जी समिति ने अपनी अंतरिम रिपोर्ट में कहा है कि साबरमती एक्सप्रेस में आग बाहर से नहीं लगाई गई थी. इस समिति ने कहा है कि आग डब्बे के भीतर ही लगी होगी और यह साक्ष्यों के आधार पर दुर्घटना ही दिखाई देती है. 27 फ़रवरी 2002 को गुजरात के गोधरा स्टेशन पर साबरमती एक्सप्रेस के एक डब्बे में आग लग जाने से 59 लोगों की मौत हो गई थी. केंद्र में यूपीए की सरकार आने के बाद रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव ने गोधरा कांड की जाँच के लिए यूसी बैनर्जी समिति के गठन की घोषणा की थी. जबकि पहले आरोप लगाए गए थे कि कारसेवकों से भरी इस ट्रेन में बाहर से आग लगाई थी. इस ख़बर के बाद गुजरात भर में दंगे भड़क गए थे जिसमें सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़ एक हज़ार से ज़्यादा लोगों की मौत हो गई थी जबकि मानवाधिकार संगठनों ने मारे गए लोगों की संख्या 2000 से ज़्यादा बताई थी. समिति ने अपनी रिपोर्ट में रेलवे की इस बात के लिए निंदा की है, उसने रेलवे एक्ट के तहत होने वाली जाँच नहीं करवाई और तत्कालीन रेलवे मंत्री और रेलवे बोर्ड के सदस्य घटनास्थल तक नहीं गए और न घायलों से मुलाक़ात की. दुर्घटना सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस बैनर्जी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि यह कहना ग़लत है कि आग बाहर से लगाई गई क्योंकि पहले कुछ जलने की गंध आई थी फिर लोगों ने धुँआ देखा और फिर आग की लपटें दिखाई पड़ीं.
समिति की रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि डिब्बे के भीतर कोई तरल पदार्थ डाल कर आग लगाई गई होती या फिर बाहर से आग लगाई गई होती तो ऐसा नहीं होता. समिति का कहना है कि डिब्बे के फर्श पर तरल पदार्थ डालकर आग लगाने की बात इसलिए भी ग़लत प्रतीत होती है क्योंकि कई घायलों के शरीर के ऊपरी हिस्से में ज़ख़्म थे न कि निचले हिस्से में. यूसी बैनर्जी ने अपनी अंतरिम रिपोर्ट में कहा है कि जो सुबूत हैं उसके आधार पर यह बात अविश्वसनीय लगती है कि एस-6 डिब्बे में त्रिशूल लिए हुए कारसेवक मौजूद थे और उन्होंने किसी व्यक्ति को आग लेकर डिब्बे के अंदर आने दिया और उन्होंने बिना शोर मचाए किसी को अपने को जलाने दिया. समिति का कहना है कि जितनी देर रेल रुकी रही और जितनी देर में रेलवे पुलिस और बड़ौदा कंट्रोल रुम को आग लगने की ख़बर दे दी गई उसके चलते यह संभव नहीं दिखाई देता कि इतनी देर में कोई डिब्बे में आग लगा सकता है. इस तरह समिति ने अपनी रिपोर्ट में 'पेट्रोल से आग लगाने', 'शरारत की कार्रवाई' या 'शॉर्ट सर्किट से लगी आग' के तर्कों को मानने से इनकार कर दिया है. रेलवे का दोष समिति का मानना है कि रेलवे एक्ट के तहत अपने आपही इस कांड की जाँच के लिए एक आयोग बन जाना चाहिए था लेकिन रेलवे ने ऐसा कुछ नहीं किया.
उल्लेखनीय है कि तत्कालीन रेलवे मंत्री नीतीश कुमार ने कहा था कि गोधरा कांड की जाँच की ज़िम्मेदारी गुजरात पुलिस की है, न कि रेलवे की. जस्टिस बैनर्जी का कहना है कि रेलवे ने दुर्घटना की जाँच के लिए सुबूतों को बचाए रखने के लिए भी कोई प्रयास नहीं किए. इसका उल्लेख करते हुए समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि एस-6 के जलने से एस-7 को भी कुछ नुक़सान हुआ था लेकिन रेलवे ने इसे तुरंत अहमदाबाद रवाना कर दिया और बाद में इसे कबाड़ में भिजवा दिया गया. समिति ने गोधरा के अग्निशमन विभाग की कार्रवाई पर भी असंतोष जताया है. |
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