| बगलिहार पर पाकिस्तान की शिकायत | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पाकिस्तान ने बगलिहार पनबिजली परियोजना के मामले में भारत के साथ मतभेदों के बाद विश्व बैंक में जाने का फैसला किया है. जम्मू कश्मीर में बगलिहार डैम बनाने की भारत की परियोजना पर पाकिस्तान को आपत्ति है और वह विश्व बैंक से मध्यस्थता की अपील करने वाला है. पाकिस्तानी अखबारों में पाकिस्तानी अधिकारियों के हवाले से ख़बरें आईं थी कि इस बारे में सोमवार की रात प्रधानमंत्री शौकत अजीज़ की अध्यक्षता में एक बैठक हुई. बैठक में फैसला किया गया कि मतभेद नहीं सुलझने के कारण विश्व बैंक से मध्यस्थता की अपील की जाए. हालांकि इस ख़बर की पुष्टि आधिकारिक तौर पर नहीं हुई है लेकिन भारत सरकार ने अपनी प्रतिक्रिया दे दी है. भारत सरकार का कहना है कि वह ऐसी किसी भी स्थिति से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार हैं. हालांकि भारत सरकार ने यह भी कहा कि इस बारे में उन्हें आधिकारिक सूचना नहीं मिली है. विवाद का इतिहास भारत और पाकिस्तान के बीच 1960 में सिंधु जल समझौता हुआ था जिसके तहत भारत से होकर पाकिस्तान जाने वाली छह नदियों के पानी के बारे समझौता हुआ था. बगलिहार परियोजना इसी का एक हिस्सा है. उस दौरान भी विश्व बैंक ने बड़ी भूमिका निभाई थी. बगलिहार परियोजना के लिए विश्व बैंक ने रिण भी दिया है. पिछले 45 सालों में पहली बार पाकिस्तान ने इस मुद्दे पर विश्व बैंक में जाने का फैसला किया है. 1965 और 71 के युद्घ में भी इस परियोजना को नुकसान नहीं हुआ था. हाल में आपसी विश्वास बढ़ाने वाले प्रस्तावों में भी बगलिहार सबसे विवादास्पद रहा था क्योंकि पाकिस्तान ने खुलकर इस मामले में तीसरे पक्ष की मध्यस्थता की मांग की थी. हालांकि पाकिस्तान पहले भी बैंक से इस मुद्दे को सुलझाने में मदद के लिए अपील कर चुका है लेकिन वह अब पहली बार उससे मध्यस्थता के लिए कह रहा है. दोनों देशों के बीच पिछले महीने में दिल्ली में बगलिहार पर वार्ता हुई थी लेकिन सहमति नहीं बन सकी. पाकिस्तानी पक्ष का कहना है कि भारत ने चनाब नदी पर 450 मेगावाट क्षमता की एक परियोजना को रोक लेने की पाकिस्तान की मांग नहीं मानी है. समस्या की जड़ पानी है क्योंकि भारत की इन नदियों से पाकिस्तान को 8000 क्यूसेक से अधिक पानी मिलता है. भारत द्वारा इन नदियों पर बांधों के निर्माण पर पाकिस्तान को हमेशा आपत्ति रहती है क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे भारत नदियों के पानी पर अपना नियंत्रण बना लेगा. |
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