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श्रीलंका में राजनीतिक अस्थिरता बढ़ी | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पिछले एक साल में श्रीलंका में ज़बरदस्त राजनीतिक अस्थिरता आई है. नवंबर 2003 राष्ट्रपति चंद्रिका कुमारतुंगा ने सरकार को यह कहकर बर्ख़ास्त कर दिया कि उसकी एलटीटीई के नज़दीकी बढ़ रही है. इसके बाद वहाँ बहुत खलबली मची. फिर अप्रैल में चुनाव हुए और इसमें रानिल विक्रमसिंघे की सत्तारुढ़ सरकार हार गई और चंद्रिका कुमारतुंगा के गठबंधन की जीत हुई. लेकिन नए सरकार के गठन के बाद भी राजनीतिक अस्थिरता में कमी नहीं आई है. नतीजा यह हुआ है कि एलटीटीई के साथ चल रही शांति वार्ता पर एक बड़ा प्रश्नचिंह लग गया है क्योंकि जब तक सरकार स्थिर नहीं होगी तब तक शांतिवार्ता आगे बढ़ नहीं सकती. इस बीच श्रीलंका में हिंसक वारदातों में बढ़ोत्तरी हुई है. एलटीटीई में टूट इसका कारण है कि मार्च में एलटीटीई का विभाजन हो गया और सबसे लंबे समय तक क्षेत्रीय कमांडर रहे करुणा एलटीटीई से अलग हो गए.
श्रीलंका के उत्तर-पूर्व में पूर्वी भाग के प्रभारी रहे करुणा ने विद्रोह कर दिया. इस विद्रोह को कुचला भी गया लेकिन इस प्रक्रिया में एलटीटीई की कई कमज़ोरियाँ सामने आ गईं. करुणा का साथ देने वाले बहुत से लोगों को एलटीटीई ने मार दिया जवाब में करुणा ने भी प्रभाकरण के लोगों को मारा. हत्या का सिलसिला अभी भी जारी है. आरोप है कि करुणा को श्रीलंका की सेना और सरकार ने सहयोग दिया. मुझे इस आरोप में सच्चाई भी नज़र आती है. आज पूर्वी इलाक़े में बट्टीकलोआ ज़िले में तमिलों की जनसंख्या सबसे अधिक है. इस ज़िले में एलटीटीई की पकड़ कमज़ोर पड़ चुकी है और यहाँ करुणा के लोग बहुत सक्रिय हैं. यहीं दोनों के बीच झड़पें हो रही हैं और दोनों दलों के लोग मारे जा रहे हैं. करुणा के दल के साथी लोगों को धमका रहे हैं कि उन्हें प्रभाकरण का साथ नहीं देना चाहिए. हालांकि एलटीटीई ने कहा था कि करुणा का अलग होना एक व्यक्ति की समस्या है लेकिन अब लगता है कि ऐसा नहीं है. इससे ये हुआ कि शांति प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए जो विश्वास सरकार और एलटीटीई के बीच होना चाहिए वो लगातार कम होता जा रहा है. मध्यस्थ का भ्रम टूटा एक बड़ा मुद्दा है कि सरकार और एलटीटीई के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाने वाले नॉर्वे और दूसरे पश्चिमी देशों का भ्रम एलटीटीई को लेकर टूटा है.
अब उन्हें लगने लगा है कि एलटीटीई पर दबाव बनाकर शांति स्थापना की कोशिश उतनी आसान नहीं है जितनी कि दिखाई देती थी. उन्हें लगने लगा है कि ये सुधरने वाली समस्या दिखाई नहीं देती. इस बीच एक महत्वपूर्ण परिवर्तन दिखाई दे रहा है और वो ये कि श्रीलंका में चुनाव और एलटीटीई के विभाजन के बाद से भारत सरकार ख़ामोशी से यह जानने की कोशिश कर रही है कि वहाँ क्या हो रहा है और क्यों हो रहा है. वैसे भारत की रुचि तो पहले भी वहाँ रही है लेकिन अब भारत पहले की तरह शोर नहीं मचा रहा है और चुपचाप इसे देख रहा है. भारत देख रहा है कि श्रीलंका की गतिविधियों से उनकी आंतरिक सुरक्षा पर क्या असर पड़ सकता है. शांति समझौते की सूरत सबसे महत्वपूर्ण तत्व इस समय है एलटीटीई की युद्धरत रहने की नीति. ऐसा लगता है कि एलटीटीई ने तय कर रखा है कि वे अलग तमिल इलम बनाएंगे और बनाकर ही रहेंगे. मेरी जो समझ एलटीटीई के बारे में है उससे मुझे लगता है कि एलटीटीई कभी किसी भी समझौते तक कभी नहीं पहुँच पाएगा. एक तरह से लगता था कि ये असंभव है. लेकिन मैं इसलिए कह रहा हूँ कि जब दो साल पहले शांति समझौता हुआ था तो लोगों को लगता था कि कोई शांतिपूर्ण हल निकल आएगा. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. शांति पूर्ण समझौता का मतलब है कि एलटीटीई ये मान ले कि वे तमिस ईलम यानी अलग तमिल राज्य की मांग छोड़ रहे हैं और भविष्य में वे श्रीलंका सरकार के आदेशों का पालन करेंगे. मुझे लगता है कि ये असंभव है. एक क्षण के लिए अगर आप इस मामले को एलटीटीई प्रमुख प्रभाकरण की दृष्टि से देख सकें तो ये साफ़ ज़ाहिर है कि बीस साल की लड़ाई और साठ हज़ार लोगों की मौत के बाद, श्रीलंका के उत्तर पूर्वी हिस्से के कई हिस्सों में कब्ज़े के बाद क्या ये लड़ाई छोड़ दी जाएगी. अब तक एलटीटीई के 19 हज़ार लोग मारे जा चुके हैं और हज़ारों लोग घायल हैं. लेकिन एलटीटीई अब भी अपनी नौसेना के लिए 'सैनिक' भर्ती कर रहा है और 10 हज़ार श्रीलंकाई रुपयों की तनख़्वाह दे रहा है. जब एलटीटीई का संग्राम शुरु हुआ था तो उनके साथ 40 लोग थे. 1987 में उनके पास इतने लोग हो गए थे कि वे भारतीय सेना के साथ लोहा लेने को तैयार हो गए. 1990 में उत्तर पूर्व का पूरा इलाक़ा उनके कब्ज़े में आया. 1995 में एलटीटीई ने सरकार के साथ आक्रामक लड़ाई शुरु कर दी. तो इस तरह से देखें तो एलटीटीई का लगातार विस्तार हुआ है. ये ठीक है कि अभी युद्ध विराम है लेकिन हालत ये हैं कि श्रीलंका की सरकार में कोई भी यह कहने को तैयार नहीं है कि वे एलटीटीई को कुचल देंगे. लोगों ने इस बारे में बात करना बंद कर दिया है और प्रभाकरण इस चीज़ को जानते हैं.
प्रभाकरण इस चीज़ को भी समझ रहा है कि यदि जिस रास्ते पर मैं चल रहा हूँ अगर उसी पर चलता रहूँ तो भी कोई मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकता. नॉर्वे दो साल से मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है और उसको अमरीका का समर्थन भी है. अमरीका कई बार कह चुका है कि वह एलटीटीई को तब तक आतंकवादी मानना बंद नहीं करेगा जब तक एलटीटीई हिंसा छोड़ नहीं देता. लेकिन इसका कोई असर नहीं हुआ है. वहाँ न केवल हिंसा जारी है बल्कि हिंसा की घटना के बाद इसकी ज़िम्मेदारी भी खुले आम स्वीकार कर रहे हैं. इसी साल जुलाई में उन्होंने कोलंबो में एक आत्मघाती हमला किया. लगभग ढाई साल बाद हुआ यह हमला अमरीकी दूतावास के क़रीब हुआ. एक तरह से लगता है कि वे पूरी तरह से विद्रोही हो गए हैं और उन्हें लगता है कि कोई भी अब कुछ नहीं कर सकता. कोलंबो में नॉर्वे और अमरीका के जो कूटनयिक हैं उनसे बात करके पता चलता है कि वे यह मान चुके हैं कि एलटीटीई किसी समझौते तक कभी नहीं पहुँचने वाला है. एलटीटीई की शिकायत है कि सरकार उत्तरी भाग में अंतरिम प्रशासन के लिए बात नहीं कर रही है. दूसरी ओर सरकार का कहना है कि अंतरिम प्रशासन की बात तब होगी जब अंतिम फ़ैसले की भी बात हो. एलटीटीई इसके लिए तैयार नहीं है, उसका कहना है कि अंतिम फ़ैसले पर बातचीत को किनारे रखो जबकि सरकार को डर है कि एक बार अंतरिम प्रशासन हो गया तो एलटीटीई बात करने से इंकार कर देगी. कुल मिलाकर लगता है कि शांति के मामले में श्रीलंका का भविष्य तो धुंधला ही दिखाई देता है. |
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