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दाता देशों ने दी श्रीलंका को चेतावनी | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
श्रीलंका को सहायता देने वाले दाता देशों ने इस बात पर कड़ी आपत्ति व्यक्त की है कि सत्ताधारी गठबंधन शांति प्रक्रिया की अनदेखी कर रहा है. दाता देशों का यह बयान ऐसे समय आया है जब नॉर्वे के मध्यस्थ एक बार सरकार और एलटीटीई के बीच बातचीत शुरू कराने की कोशिश कर रहे हैं. पिछले साल दोनों पक्षों के बीच बातचीत रुक गई थी. इस समय नॉर्वे के दूत एरिक सोल्हेम एलटीटीई से बातचीत कर रहे हैं इसके बाद वे राष्ट्रपति चंद्रिका कुमारतुंग से भी मुलाक़ात करेंगे. दरअसल अंतरराष्ट्रीय समुदाय एलटीटीई और श्रीलंका सरकार के बीच बातचीत शुरू होने में नाकामी के कारण चिंतित है. राष्ट्रपति चंद्रिका कुमारतुंग से मुलाक़ात करने के बाद प्रमुख दाता देश जापान, यूरोपीय संघ में शामिल देशों और अमरीका ने सत्ताधारी गठबंधन में शामिल जेवीपी के ख़िलाफ़ कड़ा बयान जारी किया है. चिंता इन देशों ने जेवीपी के नेतृत्व में शांति प्रक्रिया के ख़िलाफ़ उठाए जा रहे क़दमों पर चिंता जताई और कहा कि गठबंधन में शामिल दल नॉर्वे की कोशिशों को भी किनारे कर रहे हैं.
मार्क्सवादी जेवीपी ने एलटीटीई के साथ बातचीत पर अड़ियल रवैया अपनाया है और नॉर्वे की मध्यस्थता का भी विरोध किया है. चंद्रिका कुमारतुंग की गठबंधन सरकार के लिए जेवीपी का समर्थन बहुत आवश्यक है. दाता देशों का कहना है कि जेवीपी ऐसे अभियान में शामिल है जो सरकार और राष्ट्रपति के रुख़ से बिल्कुल अलग है. हाल ही में जारी एक बयान में एलटीटीई नेता ने कहा था कि सरकार के साथ बातचीत उस समय तक असंभव है जब तक सरकार अपने आंतरिक मतभेदों को सुलझा नहीं लेती. दाता देशों ने राष्ट्रपति चंद्रिका कुमारतुंग से अपील की है कि वे इस स्थिति से निपटें. दाता देशों का कड़ा बयान ऐसे वक़्त आया है जब नॉर्वे के दूत एरिक सोल्हेम दोनों पक्षों से बातचीत के लिए श्रीलंका में हैं. दोनों पक्षों के बीच शांति वार्ता पिछले साल से ही रुकी हुई है. |
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