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श्रीलंका में फिर मृत्युदंड का प्रावधान | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
श्रीलंका सरकार ने मृत्युदंड को फिर से लागू करने का फ़ैसला किया है. सरकार की घोषणा के अनुसार हत्या, बलात्कार और नशीली दवाओं के व्यापार के लिए मौत की सज़ा दी जा सकेगी. इसके अलावा सरकार ने देश में न्यायप्रणाली से जुड़े लोगों की सुरक्षा के लिए एक विशेष इकाई का गठन करने की भी घोषणा की है. श्रीलंका में पिछले 28 सालों से किसी को मौत की सज़ा नहीं दी गई है क्योंकि 1976 के बाद से इसका प्रावधान नहीं था और क़ानूनी प्रावधानों के अनुसार मौत की सज़ा अपने आप आजीवन कारावास में तब्दील हो जाया करती थी. हालांकि सरकार ने 2001 में मौत की सज़ा को आजीवन कारावास में तब्दील करने के क़ानून को वापस ले लिया था. जज की हत्या के बाद शुक्रवार को श्रीलंका की राजधानी कोलंबो में हाईकोर्ट के एक जज की हत्या के बाद शनिवार को चंद्रिका कुमारतुंगा ने ये आदेश जारी किए हैं. संदेह है कि जज की हत्या के पीछे नशीली दवाओं की तस्करी करने वाले एक गिरोह का हाथ है. जज सारथ अंबेपितिया के बारे में बताया जाता है कि उन्होंने नशीली दवाओं की तस्करी करने वाले बहुत से लोगों को मौत की सज़ा सुनाई थी. बीबीसी संवाददाता के अनुसार इन सभी मामलों में अभी ऊपरी अदालतों में अपील आदि की प्रक्रिया चल रही है. बताया जाता है कि बच्चों का यौन शोषण करने वालों को भी इस जज ने कड़ी सज़ाएँ दी थीं. सारथ अंबेपितिया वही जज हैं जिन्होंने 2002 में अभियुक्त की अनुपस्थिति में चले एक मुक़दमें के बाद तमिल विद्रोहियों के संगठन एलटीटीई के नेता प्रभाकरण को 200 साल की सज़ा सुनाई थी. प्रभाकरण को यह सज़ा 1996 में कोलंबो के एक बैंक में किए गए बम हमले के आरोप में सुनाई गई थी. इस हमले में 91 लोगों की मौत हो गई थी. |
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