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बुधवार, 01 दिसंबर, 2004 को 18:33 GMT तक के समाचार
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लोगों को बचाते अपनी जान गँवाई

ग़ुलाम दस्तगीर की एक फ़ाइल फ़ोटो
ग़ुलाम दस्तगीर को न रेलवे ने सम्मान दिया न सरकार के किसी और विभाग ने
2 दिसंबर 1984 को यूनियन कार्बाइड दुर्घटना के बाद जब हर किसी को अपनी जान की पड़ी थी, तब कुछ ऐसे लोग भी थे जिन्होंने दूसरों की जान बचाना ज़्यादा ज़रूरी समझा, अपना बहुत कुछ खो कर भी.

इनमें से एक थे, भोपाल के रेलवे स्टेशन सुपरिटेंडेंट ग़ुलाम दस्तगीर, जो उस रात भोपाल रेलवे स्टेशन पर ड्यूटी कर रहे थे.

दो दिसंबर की आधी रात के आसपास डिप्टी स्टेशन सुप्रीटेंडेंट गुमाल दस्तगीर ने जब अपनी ड्यूटी संभाली तो भोपाल रेलवे स्टेशन पर सब कुछ सामान्य सा था.

उस समय रात 11 बजे के आसपास का वक्त हो चला था. भोपाल होकर गुजरने वाली एक एक्सप्रेस ट्रेन को रवाना करके रेलवे कर्मचारी थोड़ा दम ले रहे थे. ग़ुलाम दस्तगीर भी कागज़ी कार्रवाइयों में मशगूल हो गए लेकिन मुंबई से गोरखपुर जा रही 116 अप के भोपाल जंक्शन में प्रवेश करते ही हालात ने कुछ दूसरा ही मोड़ ले लिया.

आँखों में जलन

मध्य रेलवे की इस लंबी रूट की ट्रेन को रिसीव करने गुलाम दस्तगीर जब अपने कमरे से निकलकर वहाँ पहुँचे तो उन्हें अपने गले और आँखों में जलन का अहसास होने लगा.

यूनियन कार्बाइड कारख़ाने से निकली ज़हरीली गैस तब तक फ़ैक्ट्री से दो किलोमीटर दूर स्थित रेलवे स्टेशन तक पहुँच चुकी थी.

ट्रेन में बैठे यात्रियों में से भी कुछ बुरी तरह खाँसने लगे थे. कुछ लोग आँखों में जलन की शिकायत कर रहे थे.

 यही एक ट्रेन थी जिसे उस दिन जल्दी भेजा गया. भेजा क्या गया, ट्रेन कुछ मिनट ही स्टेशन पर खड़ी हो पाई. निज़ामपुरा से ही यात्रियों को परेशानी हो रही थी. कुछ भगदड़ भी मचाने लगे थे
रामबली वर्मा, असिस्टेंट स्टेशन मास्टर

आधी रात के कुछ देर बाद से शुरु हुई अफ़रातफ़री के माहौल में घर-बार छोड़कर भाग रहे लोगों में से कुछ ने रेलवे स्टेशन पर पनाह ली थी और अब सामने खड़ी ट्रेन में ठूँस रहे थे. ख़तरे को भाँपते ही गुलाम दस्तगीर ने ट्रेन को फ़ौरन रवाना करने का फैसला किया.

उनके दोस्त असिस्टेंट स्टेशन मास्टर रामबली वर्मा ने बताया, "यही एक ट्रेन थी जिसे उस दिन जल्दी भेजा गया. भेजा क्या गया, ट्रेन कुछ मिनट ही स्टेशन पर खड़ी हो पाई. निज़ामपुरा से ही यात्रियों को परेशानी हो रही थी. कुछ भगदड़ भी मचाने लगे थे."

उन्होंने यह भी बताया कि दस्तगीर ने इसके फ़ौरन बाद अपने आला-अधिकारियों से संपर्क किया और उन्हें फ़ैक्ट्री से जहरीली गैस के रिसाव की सूचना दी ताकि भोपाल आने वाली गाड़ियों को पहले ही रोक लिया जाए और यात्रियों की जान ख़तरे में न पड़े.

वर्मा बताते हैं, "उस दिन इस ट्रेन के बाद कोई भी ट्रेन इस ओर नहीं भेजी गई. यहाँ तक की मालवाहक गाड़ियाँ भी नहीं."

वर्मा ख़ुद रेलवे स्टेशन से आधा किलोमीटर दूर स्थित अपने सरकारी आवास से अपने परिवार के साथ भागकर स्टेशन पहुँचे थे ताकि ज़हरीली गैस से बचने के लिए भोपाल से कहीं दूर जा सकें. यही इरादा उनके जैसे दूसरे हज़ारों लोगों का भी था जो तब तक स्टेशन पर हज़ारों की संख्या में जमा हो गए थे.

 मैंने ग़ुलाम दस्तगीर को एक प्लेटफार्म से दूसरे पर भागते देखा, मुसाफिरों की मदद करते हुए. हालाँकि खुद उनकी हालत अच्छी नहीं थी पर वो पीड़ितों और अपने साथी कर्मचारियों को अस्पताल भेजने और उनकी मदद करने में लगे हुए थे
मिर्ज़ा अहमद ख़ान, प्रत्यक्षदर्शी

वहाँ एक आदमी खड़ा नहीं दिख रहा था. लोग उलटियाँ कर रहे थे. कुछ को जबर्दस्त दस्त आ रहा था और वह जहाँ जगह मिल रही थी, वहीं शौच-क्रिया से निवृत हो रहे थे. पूरे स्टेशन पर चीख-पुकार मची हुई थी.

दस्तगीर के एक और मित्र, रेलवे अधिकारी मिर्ज़ा अहमद ख़ान, जो करीब तीन बजे स्टेशन पर पहुँचे थे, बताते हैं, "मैंने ग़ुलाम दस्तगीर को एक प्लेटफार्म से दूसरे पर भागते देखा, मुसाफिरों की मदद करते हुए. हालाँकि खुद उनकी हालत अच्छी नहीं थी पर वो पीड़ितों और अपने साथी कर्मचारियों को अस्पताल भेजने और उनकी मदद करने में लगे हुए थे.''

फ़र्ज़

वो बताते हैं, ''दस्तगीर द्वारा रेलवे को दी गई सूचना के बाद रात के दो-ढ़ाई बजे के करीब चार आपातकालीन मेडिकल-वैन भोपाल आ गई थी जिससे वहाँ मौज़ूद लोगों को राहत मिली. ग़ुलाम दस्तगीर ने ड्यूटी तभी छोड़ी जब उनकी स्थिति बिगड़ गई और उन्हें अस्पताल ले जाना पड़ा."

इस दुर्घटना के बाद के 19 लम्बी रातें ग़ुलाम दस्तगीर ने अस्पतालों में काटे. ज़हरीली गैस के कारण उनके गले में जख्म सा हो गया था. जवान बेटों की मौत का दुख भी उन्हें झेलना पड़ा.

 हमारे एक जवान बेटे की मौत हो गई और दूसरा सख़्त बीमार है. उसे गैस से एलर्जी की वजह से चमड़े का मर्ज़ हो गया है लेकिन इस त्याग के लिए मेरे पति को किसी ने कुछ नहीं दिया, यहाँ तक कि उनके विभाग ने भी नहीं
फ़हमीदा, ग़ुलाम दस्तगीर की पत्नी

उनकी पत्नी फ़हमीदा उन्हें याद करते हुए कहती हैं, ''मैंने उन्हें हमेशा से वक्त का पाबंद और फ़र्ज़ की तरफ झुका देखा. हमारी जब शादी हुई थी तब वह सुखी सेवतिया नाम की जगह पर काम कर रहे थे. चूँकि ड्यूटी का वक्त ट्रेनों से मेल नहीं खाता था, इसीलिए वह साइकिल से जाते थे लेकिन देर से काम पर जाना उन्हें बिल्कुल पसंद न था. एक बार वहाँ एक रेल-दुर्घटना हो गई थी. उस समय वो तीन दिनों तक घर ही नहीं आए थे.''

वो दुखी होकर बताती हैं, ''हमारे एक जवान बेटे की मौत हो गई और दूसरा सख़्त बीमार है. उसे गैस से एलर्जी की वजह से चमड़े का मर्ज़ हो गया है लेकिन इस त्याग के लिए मेरे पति को किसी ने कुछ नहीं दिया, यहाँ तक कि उनके विभाग ने भी नहीं.''

भारतीय रेल ने गुलाम दस्तगीर को उनकी कर्तव्यपराणता और मानवता के लिए की गई अटूट सेवा के लिए कोई सम्मान नहीं दिया.

और तो और, तीन दिसंबर, 1984 को फ़र्ज़ निभाते हुए प्राण त्याग देने वाले रेलवे कर्मचारियों की याद में भोपाल रेलवे स्टेशन पर जो नाम पट्टिका लगाई गई है, उसमें ग़ुलाम दस्तगीर का नाम तक नहीं है.

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