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चीन के लहसुन से परेशान हैं किसान | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
वैश्वीकरण का एक परिणाम यह ज़रूर रहा है कि जो बात कभी बिल्कुल स्थानीय, छोटी कही जाती थी, ज़रा सी खोज़ या पूछताछ करने के बाद यह लगता है कि इसका संदर्भ तो अंतरराष्ट्रीय है. यानी भूमंडलीकरण के बाद स्थानीय और विश्व स्तर के महत्व के मुद्दे एक से लगते हैं. राजस्थान के जोधपुर ज़िले के एक छोटे से गाँव में हमें कई मन फसलों के ढेर दिखाई दिए. ये लहसुन के ढेर हैं. लगभग 300 क्विंटल लहसुन का यह ढेर यहाँ करीब छह महीने से रखा हुआ है. यह यहाँ इसलिए पड़ा हुआ है क्योंकि इसका उचित मूल्य अभी नहीं मिल पा रहा है. लेकिन उनको उम्मीद है कि इसका उचित मूल्य मिलेगा. उनको उम्मीद तो है पर यह मुश्किल लगता है. चीन का लहसन दरअसल, चीन का लहसुन आ जाने से देसी लहसुन का बाज़ार गिर रहा है. चीन से लहसुन क्यों आने दे रही है सरकार. इस पर पता चला कि विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) से समझौता होने के कारण सरकार इसे रोक नहीं सकती. इस किसान का कहना है कि डब्ल्यूटीओ के समझौते के तहत जिन सहमतियों पर हस्ताक्षर हो रहे हैं इसका सीधा असर कृषि उत्पादों पर पड़ा है. अच्छा समर्थन मूल्य तो दूर, इन्हें लहसुन के लिए जो पैसा लगाना पड़ता है वो भी वापस नहीं मिल रहा है. वे कहते हैं, "कभी तो भाव आसमान छू लेता है, कभी इतना नीचे आ जाता है कि जो खर्चा है वह भी नहीं निकल पाता." तो लहसुन क्यों उगाते हैं, इस सवाल के जवाब में वे कहते हैं, "मजबूरी है, हम बड़ी खेती नहीं कर सकते, इसलिए लहसुन, प्याज, मिर्ची, मूंगफली की खेती करते हैं." दाम और कर्ज़ यह बहुफसली इलाका है तो वे दूसरी फसलें क्यों नहीं उगाते? वे बताते हैं, "इस समय तो लहसुन ही होती है, उससे पहले मूंगफली, मिर्ची और लहसुन के बाद प्याज़ की खेती करेंगे. लेकिन हमें लहसुन, प्याज़ की लागत मूल्य है वह मूल्य भी हमें नहीं मिल पाता. इसका नतीजा रहा है कर्ज़." वे कहते हैं, "दाम के भरोसे तो किसान अपना कर्ज़ा उतार ही नहीं सकता, कुछ बड़े किसान किसी प्रकार अपना काम चला लेते हैं, लेकिन जो छोटे किसान हैं वो कभी ऊपर उठ ही नहीं सकते इस दाम के कारण, साहूकार से लेकर काम चलाते हैं." साहूकार कितने पर कर्ज़ देता है, ब्याज़ दर क्या है? इस सवाल पर जो जवाब मिला उससे रोंगटे ही खड़े हो गए. एक किसान ने बताया, "साहूकार 24 प्रतिशत पर कर्ज़ देता है." वे कहते हैं कि जब कई महीने तक यह फ़सल यूँ ही रखी रहेगी तो डीज़ल और पेट्रोल के बढ़े दामों के कारण कम नुक़सान तो इसे ज़लाने में होगा. उनका कहना है कि दो महीने में या इसके बाद इसकी स्थिति और बिगड़ जाएगी. वे कहते हैं, "अगर यही दाम रहे तो इस लहसुन को हम जलाएँगे और क्या करेंगे. छह महीने हम रख रहे हैं." किसान दुखी हैं, वे मजबूरी में लहसुन की खेती कर रहे हैं. सिर्फ़ इस उम्मीद में कि शायद अगली बार ठीक दाम मिल जाएँगे. मजबूरी हालाँकि राजस्थान के ही एक दूसरे हिस्से के गंगानगर ज़िले में किसान बुनियादी ज़रूरतों के पूरा न होने कारण पुलिस से भिड़ गए थे, फायरिंग तक की नौबत आ गई थी और दो किसान मारे भी गए थे. लेकिन यहां के किसानों का दावा है कि वे उग्र नहीं हैं और बहुफसलीय इलाक़ा होने के कारण उनके पास संगठित होने का समय ही नहीं है. भारतीय किसान संघ से जुड़े एक किसान के अनुसार मज़दूर संगठित हो सकते हैं किसान नहीं. किसान कहते हैं, "उद्योगपति तो कई हैं, एक तो वे पढ़े लिखे होते हैं, एक फोन हजार फैक्ट्री में हो जाए तो पूरा भीड़ इकट्ठी हो जाती है. हमें तो कभी बिज़ली रात के 10 बज़े, कभी 6 बजे आती है तो हम आपस में एक दूसरे से संपर्क तो कर ही नहीं सकते." तो क्या राज्य में भारी बहुमत से जीती नई सरकार बनने से या केन्द्र में सरकार की परिर्वतन से किसानों को कोई फ़ायदा हुआ है? इस सवाल पर वे कहते हैं, "सरकार तो बदलती रहती हैं, नीतियाँ तो वही रहती हैं किसान को दबाओ और कोई नीति नहीं है. अगर यह नहीं रहती तो फिर सब्सीडी में बाहर से जो माल आता है उस पर एक्साइज़ ड्यूटी अगर बढ़ जाती हो हमें कुछ राहत मिल जाती." यहाँ के कुछ किसान खेती की तुलना जुए से भी करते हैं. यूरोप के जैसे विकसित राष्ट्रों में भी कृषि एक ऐसा क्षेत्र है जिसे संरक्षण मिल रहा है, किन्तु भारत जैसे देशों में 'सरकार की भूमिका कम से कम हो' इस तर्क की मार सीधे भारत के दो-तिहाई इस कृषि वर्ग को सहन करनी पड़ रही है. |
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