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'खाना खिलाने पर प्रतिबंध' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने सार्वजनिक स्थानों पर आयोजित विवाह समारोहों में मेहमानों को खाना खिलाने पर लगाए गए प्रतिबंध को उचित ठहराया है. अदालत ने कहा है कि यह प्रतिबंध इस्लाम के उसूलों के ख़िलाफ़ नहीं है और इसे लागू रखना चाहिए. अदालत ने कहा है कि यह प्रतिबंध लोगों को अपनी संपन्नता की डींग मारने और शान दिखाने से रोकता है. पाकिस्तान सरकार ने यह प्रतिबंध 1997 में लगाया था लेकिन व्यावहारिक तौर पर इसे अनदेखा किया जाता है क्योंकि प्रतिबंध को माना जाए तो शादियों में सिर्फ़ चाय और शीतल पेय ही दिए जा सकते हैं. राष्ट्रव्यापी क़ानून सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सारे देश में यह प्रतिबंध पूरी तरह लागू होना चाहिए. अपने विस्तृत निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह तर्क नहीं माना जा सकता कि प्रतिबंध लगाने वाला क़ानून ग़ैर-इस्लामी है क्योंकि यह 'वलीमा' या शादी के 'रिसैप्शन' पर प्रतिबंध लगाता है. अदालत ने कहा है कि शादी के मौक़े पर 'दावत-ए-वलीमा' की आज़ादी है लेकिन मेहमानों को खाना खिलाने के बहाने अपनी शानो-शौक़त दिखाने पर प्रतिबंध होना चाहिए. अदालत ने कहा कि यह क़ानून शादी के मौक़े पर घर में परिवार के सदस्यों और मेहमानों को खाना खिलाने पर प्रतिबंध नहीं लगाता. कुरीतियाँ सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सरकार का फ़ैसला इस्लाम की शिक्षा के अनुरूप है क्योंकि इस्लाम इस बात पर ज़ोर देता है कि जीवन सादा होना चाहिए. इस क़ानून से कम आमदनी वाले लोगों को राहत मिलती है वरना वे शादियों में बहुत पैसा ख़र्च करने पर मजबूर हो जाते हैं. सुप्रीम कोर्ट ने दहेज प्रथा की भी आलोचना की और कहा कि सरकार को चाहिए कि वह इसे रोकने की हर संभव कोशिश करे. सुप्रीम कोर्ट ने 'मेंहदी' और 'बारात' जैसे रिवाज़ों की भी आलोचना करते हुए कहा कि दहेज प्रथा के साथ ही ये सभी रिवाज 'हिंदुओं ने शुरू किए' और इनका शादियों की इस्लामी परंपरा से कुछ भी लेना देना नहीं है. |
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