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राज्यपाल के इस्तीफ़े को लेकर विवाद | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
केंद्र और तमिलनाडु सरकार के बीच पिछले कई दिनों से राज्यपाल के मामले को लेकर चल रहे मतभेद शुक्रवार को कई नाटकीय घटनाक्रमों के साथ खुल कर सामने आ गए. तमिलनाडु के राज्यपाल पीएस राममोहन राव ने अपने तबादले के ख़िलाफ़ तमिलनाडु सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका पर न्यायालय के किसी प्रकार के रोक न लगाने के आदेश के बाद इस्तीफ़ा दे दिया. लेकिन न्यायालय में मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार के वकील ने गुरुवार को केंद्रीय गृह मंत्री शिवराज पाटिल और मुख्यमंत्री जयललिता के बीच फ़ोन पर हुई बातचीत का ब्यौरा पेश कर सनसनी फैला दी. इस ब्यौरे के अनुसार गृह मंत्री ने मुख्यमंत्री को राज्यपाल राममोहन राव की जगह आंध्र प्रदेश के राज्यपाल सुरजीत सिंह बरनाला को तमिलनाडु का राज्यापल नियुक्त करने की जानकारी दी आपत्ति जबकि मुख्यमंत्री ने इस मामले पर विश्वास में न लेने पर आपत्ति जताई और तबादले के कारण जानने चाहे.
बीबीसी हिंदी ने जब गृह मंत्री से संपर्क किया तो उन्होंने इस मामले पर फ़िलहाल कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की. शिवराज पाटिल ने कहा, "राज्यपाल के पद की गरिमा होती है और किसने क्या कहा इसका जवाब देकर मैं तू-तू मैं-मैं में पड़ना नहीं चाहता" माना जा रहा है कि केंद्र के सत्ताधारी गठबंधन में तमिलनाडु के सभी घटक दलों डीएमके, पीएमके और एमडीएमके ने केंद्र में कांग्रेस नेतृत्व वाली सरकार पर राज्यपाल को बदलने के दबाव डाल रहे थे. अब राममोहन राव ने किसी पूर्वोत्तर राज्य में अपनी नियुक्ति पर असहमति व्यक्त करते हुए पद तो छोड़ दिया है. लेकिन केंद्र और राज्य सरकार के बीच संबंध कैसे हों, विरोधी दलों के शासन वाले राज्यों में राज्यपालों को भेजने की परंपरा क्या हो और क्या एक राज्य सरकार किसी गुप्त जानकारी को सार्वजनिक कर सकती है- इन सभी गंभीर विषयों का सवाल तो उठने ही लगे हैं. |
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