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बर्मा के राष्ट्राध्यक्ष नई दिल्ली पहुँचे | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बर्मा के राष्ट्राध्यक्ष थान श्वे अपनी छह दिवसीय भारत यात्रा के लिए रविवार को नई दिल्ली पहुँचे. यह पिछले 25 बरसों में बर्मा के किसी शीर्ष नेता की पहली भारत यात्रा है. इस सप्ताह के शुरु में बर्मा के प्रधानमंत्री थिन न्यून्त को हटाकर उनकी जगह लेफ़्टिनेंट जनरल सो विन को नियुक्त कर दिया गया था. जिसकी कई देशों ने निंदा की थी. बर्मा के नेता के यात्रा कार्यक्रम में इस घटना के बाद भी कोई परिवर्तन नहीं हुआ है. बर्मा में लोकतंत्र की मांग कर रहे संगठन थान श्वे की भारत यात्रा का विरोध कर रहे हैं. उनका कहना है कि यह बर्मा में मानवाधिकार आंदोलन को एक झटका है. शनिवार को डेढ़ सौ से अधिक लोगों ने दिल्ली में इसके विरोध में प्रदर्शन भी किया. उल्लेखनीय है कि बर्मा में सैनिक शासन है और लोकतंत्र समर्थक नेता आंग सान सू ची को नज़रबंद किए जाने के सरकार के निर्णय की पूरी दुनिया में निंदा होती रही है. यात्रा का महत्व भारत पहले आंग सान सू ची का खुला समर्थन करता रहा है लेकिन 1993-94 से बर्मा के सैन्य सरकार के साथ संबंध बनाने में लगा हुआ है.
बीबीसी के संवाददाता सुबीर भौमिक का कहना है कि थान श्वे की भारत यात्रा महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे यह संकेत मिल सकता है कि बर्मा के सैनिक शासन को दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का समर्थन हासिल है. भारत ने 1990 के दशक से बर्मा के साथ व्यापार और निवेश बढ़ा रहा है. विश्लेषकों का कहना है कि क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए भारत बर्मा के साथ खड़ा हो रहा है. हालांकि यह भी माना जाता है कि बर्मा के साथ इस तरह से संबंध सुधारने का लाभ भारत को कम मिलेगा बर्मा को ज़्यादा. |
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