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शुक्रवार, 17 सितंबर, 2004 को 15:49 GMT तक के समाचार
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कश्मीर में आत्महत्या में बढ़ोतरी

कश्मीर में एक मृत व्यक्ति के रिश्तेदार
कश्मीर में परिजनों के मारे जाने से हज़ारों लोगों को सदमा पहुँचा है
ग्यारहवीं में पढ़ने वाली पिंकी ने उस दिन बहुत देर तक टीवी देख रही थी, पिता ने डाँट लगाई और कहा कि उसे पढ़ाई पर ध्यान देना चाहिए.

एक घंटे के बाद वह अपने कमरे में बेहोशी की हालत में पाई गई, उसने तीस से अधिक नींद की गोलियाँ खाकर आत्महत्या करने की कोशिश की थी, क़िस्मत अच्छी थी इसलिए समय पर अस्पताल पहुँची और बचा ली गई.

श्रीनगर के प्रतिष्ठित एसएमएचएस अस्पताल में आत्महत्या के प्रयास के ढेर सारे मामले हर महीने आते हैं.

श्रीनगर में गर्वनमेंट मेडिकल कॉलेज के मेडीसिन विभाग के अध्यक्ष गुलाम कादिर ख़ान का कहना है कि पिछले कुछ समय में आत्महत्या के प्रयास के मामले बहुत तेज़ी से बढ़े हैं.

डॉक्टर खान कहते हैं, "कश्मीर में सशस्त्र संघर्ष शुरू होने से पाँच वर्ष पहले अस्पताल में आने वाले कुल मामलों में से आत्महत्या के प्रयास के मामले सिर्फ़ एक प्रतिशत होते थे, लेकिन 2001-2002 में यह आंकड़ा बढ़कर ग्यारह प्रतिशत तक हो गया."

कश्मीर में महिलाएँ
हिंसा का सबसे अधिक असर महिलाओं पर हुआ है

डॉक्टर ख़ान ने पिछले कुछ वर्षों में एसएमएचएस अस्पताल में लाए गए लोगों के आंकड़ों का गहन विश्लेषण किया है, उनका अध्ययन एक ही अस्पताल के आंकड़े पर आधारित है लेकिन उससे स्थिति की गंभीरता का आभास हो जाता है.

उन्होंने अपने विश्लेषण में पाया कि आत्महत्या के प्रयास के 22 प्रतिशत मामलों का सीधा संबंध घाटी में जारी संघर्ष से है.

 सशस्त्र संघर्ष ने कश्मीर में लोगों में आम चिड़चिड़ापन पैदा कर दिया है और उनकी सहनशीलता का स्तर काफ़ी कम हो गया है
डॉक्टर अब्दुल क़ादिर ख़ान

इस 22 प्रतिशत में वैसे लोग शामिल हैं जिन्हें सेना या चरमपंथियों ने प्रताड़ित किया हो या फिर उनके रिश्तेदार सशस्त्र संघर्ष के दौरान मारे गए हों.

मिसाल के तौर पर, पुलवामा के अब्दुल रहमान ने कीटनाशक पीकर जान देने की कोशिश की क्योंकि उनके दस वर्षीय बेटे की सेना और चरमपंथियों के बीच हुई गोलीबारी में मौत हो गई थी.

डॉक्टर ख़ान के मुताबिक, घाटी में हिंसा के बाद आत्महत्या की दूसरी सबसे बड़ी बेरोज़गारी है, इसके बाद नंबर आता है कि बिगड़े हुए सामाजिक संबंधों और मानसिक संतुलन के अभाव का.

डॉक्टर ख़ान कहते हैं, "सशस्त्र संघर्ष ने कश्मीर में लोगों में आम चिड़चिड़ापन पैदा कर दिया है और उनकी सहनशीलता का स्तर काफ़ी कम हो गया है."

जीने-मरने के बीच

कश्मीर के एक प्रमुख मनोवैज्ञानिक डॉक्टर अरशद हुसैन का कहना है कि अस्पतालों में आने वाले ज़्यादातर मामले अर्ध-आत्महत्या के होते हैं यानी लोग बेचैन होकर आत्महत्या की कोशिश करते हैं और अस्पताल पहुँचने के बाद जीना भी चाहते हैं.

कश्मीरी जनता
कश्मीर के आम लोग चरमपंथियों और सेना के बीच फँसे हैं

कश्मीर विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र विभाग के अध्यक्ष डॉक्टर बशीर अहमद डबला ने घाटी के पाँच प्रमुख अख़बारों की रिपोर्टों के आधार पर कश्मीर में आत्महत्या के बढ़ते मामलों का अध्ययन किया है.

उनका कहना है कि वर्ष 1999-2000 में कश्मीर में आत्महत्या के लगभग 2000 मामले सामने आए थे, डॉक्टर डाबला कहते हैं कि इसकी बड़ी वजह समाज में आया बिखराव है.

डॉक्टर डबला का कहना है कि कश्मीर में युवाओं और महिलाओं में आत्महत्या अधिक आम है, उनका कहना है कि औरतें सशस्त्र संघर्ष से सबसे अधिक प्रभावित हुई हैं जबकि युवा चरमपंथियों और सेना के बीच फँसकर रह गए हैं.

मनोवैज्ञानिक और समाजशास्त्री मानते हैं कि धार्मिक विश्वास एक महत्वपूर्ण कारक है जो आत्महत्या को रोकने में मदद करता है.

डॉक्टर डबला कहते हैं कि रमज़ान के महीने में आत्महत्याओं की दर सबसे कम पाई गई क्योंकि इस महीने में लोग धार्मिक मान्यता के आधार पर जीने का प्रयास करते हैं.

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