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असम में बंद, जनजीवन प्रभावित | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत के पूर्वोत्तर राज्य असम में पिछले दिनों हुए बम विस्फोट के विरोध में 12 घंटे के बंद का आह्वान किया गया. इसकी वजह से राज्य में जनजीवन प्रभावित हुआ. बंद का आह्वान ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन या आसू ने किया. उल्लेखनीय है कि ये संगठन अवैध आप्रवासियों का विरोध करते हुए 1980 के दशक में राज्य में बड़ा आंदोलन चला चुका है. इस संगठन का कहना है कि वह आतंक की राजनीति के विरुद्ध है और इसका विरोध करता है. भले ही ये विद्रोहियों की ओर से हो या फिर सरकार की ओर से. असम के अधिकतर हिस्सों में इस बंद से जनजीवन प्रभावित हुआ. आसू के कार्यकर्ताओं ने राज्य के विभिन्न हिस्सों में प्रदर्शन किया और पुलिस की ओर से ये बंद रोकने की कोई ख़ास कोशिश भी नहीं हुई. धेमाजी में हुए बम विस्फोट में कई स्कूली छात्र मारे गए थे और वहीं सबसे ज़बरदस्त प्रदर्शन हुआ है. कड़े प्रबंध पुलिस अधिकारियों का कहना है कि बंद पूरी तरह शांतिपूर्ण रहे इसलिए काफ़ी ज़बरदस्त प्रबंध किए गए हैं. अधिकारियों का कहना है कि सड़कों पर यातायात नहीं के बराबर है और दुकानें बंद हैं. आसू के प्रवक्ता समुज्जल भट्टाचार्य ने बीबीसी को बताया कि असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई को इस विस्फोट की नैतिक ज़िम्मेदारी लेते हुए इस्तीफ़ा दे देना चाहिए. उनका कहना था कि आसू इस बात का ख़्याल रखेगा कि ये बंद पूरी तरह शांतिपूर्ण रहे. इस विस्फोट की ज़िम्मेदारी यूनाइटेड लिबरेशन फ़्रंट ऑफ़ असम या अल्फ़ा पर डाली गई है और उसने भी इससे इनकार नहीं किया है. उसका कहना है कि जब ये स्पष्ट था कि संगठन स्वतंत्रता दिवस के कार्यक्रमों में बाधा डालेगा ही तो उसने नागरिकों को वहाँ क्यों जाने दिया. मगर आसू का कहना है कि जब वहाँ पर बच्चे मौजूद थे तो वहाँ बम विस्फोट नहीं करना चाहिए था. असम में कई अन्य नागिरक संगठनों ने भी अल्फ़ा के इस क़दम का विरोध किया है. |
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