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सरकार का 'पोटा' रद्द करने का फ़ैसला | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत सरकार ने आतंकवाद गतिविधि निरोधक क़ानून (पोटा) को रद्द करने का निर्णय लिया है. तीन घंटे चली मंत्रिमंडल की बैठक में मंगलवार को यह निर्णय लिया गया. पोटा की जगह लेने के लिए 1967 के ग़ैरक़ानूनी गतिविधि निरोधक क़ानून में संशोधन किया जाएगा. केंद्र की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार ने अपने न्यूनतम साझा कार्यक्रम में पोटा को वापस लेने की बात कही थी. मंत्रिमंडल की बैठक के बाद सूचना एवं प्रसारण मंत्री जयपाल रेड्डी ने कहा कि सरकार की कोशिश होगी कि मानसून (या बजट सत्र) में ही पोटा को रद्द करने और नया क़ानून लागू करने का प्रस्ताव पारित किया जा सके. वैसे पोटा की अवधि अगले महिने समाप्त हो रही थी और यदि सरकार इसे रद्द करने का फ़ैसला नहीं करती तो भी पोटा का अस्तित्व समाप्त हो जाता लेकिन सरकार ने मंगलवार को इसे रद्द करने का फ़ैसला किया. उन्होंने कहा, "1967 के ग़ैरक़ानूनी गतिविधि निरोधक क़ानून में बड़े संशोधन किए जाएँगे जिससे कि राष्ट्रीय सुरक्षा पर आँच न आए और अंतरराष्ट्रीय क़ानूनी बाध्यताओं को भी पूरा किया जा सके." पोटा के तहत चल रहे मामलों के बारे में केंद्रीय मंत्री रेड्डी ने कहा कि उन मामलों पर पोटा की समीक्षा समिति ही विचार करेगी. उनका कहना था कि इस समिति को और अधिक अधिकार देने की आवश्यकता नहीं है. जयपाल रेड्डी ने कहा कि समीक्षा के बाद बेक़सूर लोगों को रिहा कर दिया जाएगा. विरोध विधेयक बनने से लेकर क़ानून बनने तक पोटा विवाद में ही रहा. तत्कालीन एनडीए सरकार ने इसे लोकसभा में तो बहुमत के आधार पर पारित करवा लिया लेकिन राज्यसभा में बहुमत न होने की वजह से सरकार को संयुक्त अधिवेशन बुला कर इसे पारित करवाना पड़ा. इस बीच सरकार ने इसे अध्यादेश के रुप में लागू कर दिया था. अध्यादेश की जगह 28 मार्च 2002 को पोटा क़ानून लागू किया गया था. वर्तमान सरकार में शामिल अधिकांश दलों ने विपक्ष में रहते हुए इस क़ानून का विरोध किया था. उनका कहना था कि इस क़ानून का दुरुपयोग होने की आशंका बनी रहेगी. बाद में ख़ुद एनडीए ने इसकी समीक्षा के लिए एक समिति का गठन कर दिया था. |
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