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सत्ता छूटी तो साथ भी खटकने लगा! | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत में अभी लोकसभा चुनाव ख़त्म हुए दो महीने भी नहीं हुए हैं और भारतीय जनता पार्टी के विश्वसनीय समझे जाने वाले सहयोगी दलों में उससे अलग होने की मांग होने लगी है. संसदीय चुनावों के ठीक पहले बीजेपी में शामिल हुए इक्का-दुक्का नेता भी उससे पल्ला झाड़ने को तैयार बैठे हैं. कुछ दिनों पहले ही जॉर्ज फ़र्नांडिस की पार्टी जनता दल (यूनाइटेड) पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के बचाव में खड़ी थी. लेकिन अब पार्टी में बीजेपी से रिश्ता तोड़ने की माँग ज़ोर-शोर से उठने लगी है. ख़ासतौर पर बिहार और झारखंड में अपना प्रभाव क्षेत्र रखने वाली जनता दल (यू) में बीजेपी के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई है इन्हीं दो राज्यों के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने. इस बारे में पूछे जाने पर पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री शरद यादव झल्ला उठते हैं और कहते हैं, "पार्टी में बहुत सारी बातें उठती हैं." लेकिन वे इस बात से इनकार भी नहीं करते. पार्टी अध्यक्ष जॉर्ज फ़र्नांडीस, शरद यादव और दिग्विजय सिंह इस पर झारखंड के दौरे पर हैं. रोष कार्यकर्ताओं में रोष इस क़दर है कि पार्टी अध्यक्ष जॉर्ज फ़र्नांडिस को उन्हें आश्वासन देना पड़ा कि अगले महीने के आख़िर में होने वाली पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में इस मुद्दे पर चर्चा कराई जाएगी. इस बारे में शरद यादव कहते हैं, "जॉर्ज साहब के बारे में कही गई यह बात ग़लत है. लेकिन राष्ट्रीय कार्यकारिणी में इस मुद्दे पर चर्चा हो सकती है." यह पूछे जाने पर कि क्या जनता दल (यू) में यह सोच बीजेपी द्वारा हिंदूत्व की ओर लौटने की बात को लेकर उठी है, शरद यादव का कहना था, "उनकी विचारधारा उनकी है और हमारी पार्टी की हमारी. हमें उससे कोई लेना-देना नहीं. लेकिन हम एनडीए के न्यूनतम साझा कार्यक्रम के लिए प्रतिबद्ध हैं." नए ठिकाने की तलाश बीजेपी के उग्र रुख़ का असर उसके मुस्लिम और पिछड़े समुदाय के वोट बैंक पर पड़ने का असर जहाँ जनता दल (यू) को उससे अलग होने की दिशा में ले जा रहा है, वहीं पार्टी में हाल ही में शामिल हुए विद्याचरण शुक्ल भी बीजेपी से अलग होने का संकेत दे रहे हैं.
एक बयान में उन्होंने अपनी हार का कारण बीजेपी के राज्यस्तरीय नेताओं पर मढ़ा और कहा कि वे अपनी आगे की रणनीति जल्द ही तय करेंगे. कहा जा रहा है कि पिछले एक साल में दो पार्टियाँ बदल चुके पुराने काँग्रेसी विद्याचरण शुक्ल को अब बीजेपी के साथ रहने में कोई फ़ायदा नहीं दिख रहा है. ख़बर ये भी है कि राष्ट्रीय तृणमूल काँग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेता भी पार्टी से अलग होकर काँग्रेस पार्टी में जाने की सोच रहे हैं. पश्चिम बंगाल में पार्टी को इन चुनावों में सिर्फ़ एक सीट ही मिल पाई थी. वहीं काँग्रेस ने उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन किया था. |
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