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शनिवार, 26 जून, 2004 को 14:05 GMT तक के समाचार
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मध्यमार्गी राजनीति करते हैं जमाली
जमाली
मुशर्रफ़ से उनके रिश्ते बनते-बिगड़ते रहे
पाकिस्तान में लोकतंत्र को लेकर जब भी सवाल उठे हैं और देश में एक सशक्त प्रधानमंत्री को लाने की बात उठी है, मामला बहुत आगे नहीं बढ़ पाया है.

एक के बाद एक कई प्रधानमंत्री बने तो ज़रूर लेकिन कोई भी अपना कार्यकाल नहीं पूरा कर पाया.

बीच में सैनिक तानाशाह की छतरी तले भी कई प्रधानमंत्री बने. वे या तो कठपुतली रहे या फिर कुछ अलग करने की कोशिश की तो पद गँवाना पड़ा.

मीर ज़फ़रुल्ला ख़ान जमाली भी ऐसे ही प्रधानमंत्री रहे और जब राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ से कड़वाहट बढ़ी जो उन्हें भी जाना पड़ा.

लगभग 19 महीने तक प्रधानमंत्री जमाली ने कई उतार-चढ़ाव देखे. पाकिस्तान में लोकतंत्र की बहाली की कोशिश, सैनिक शासन से संतुलन, राष्ट्रपति के अधिकार को लेकर तनातनी और सबसे ऊपर भारत के साथ बनते-बिगड़ते रिश्ते.

वैसे तो बड़े नीतिगत फ़ैसलों में प्रधानमंत्री जमाली की भूमिका न के ही बराबर रही लेकिन गाहे-बगाहे उन्होंने अपनी उपस्थिति दर्ज करने की कोशिश ज़रूर की.

इन्हीं में से एक था भारत के साथ द्विपक्षीय बातचीत में तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के साथ अपने स्तर पर बातचीत.

लेकिन घरेलू कट्टरपंथी राजनीति और सैनिक शासन के बीच संतुलन करना उनके लिए न आसान था और न रहा.

अब प्रधानमंत्री पद से त्यागपत्र के बाद पाकिस्तान की राजनीति में उनकी भूमिका क्या होगी, यह तो आने वाला समय ही बताएगा.

राजनीतिक जीवन

मीर ज़फ़रुल्ला ख़ान जमाली एक पुराने राजनीतिज्ञ हैं और उनका संबंध बलूचिस्तान के एक ऐसे परिवार से है जिसमें कई राजनीतिज्ञ हुए हैं.

वह राष्ट्रीय और प्रांतीय दोनों ही असेंबलियों के सदस्य रह चुके हैं और वे दोनों ही स्तर पर मंत्री रह चुके हैं.

अपने राजीतिक जीवन की शुरुआत में ही वह मुस्लिम लीग में शामिल हो गए थे और वह पाकिस्तान के उन गिने-चुने राजनीतिज्ञों में हैं जिन्होंने कभी दल-बदल नहीं किया.

जमाली की राजनीति
कई बार केंद्र और राज्य में मंत्री
1988-बलूचिस्तान के कार्यवाहक मुख्यमंत्री
1997-सांसद
2002-पीएमएल क्यू के महासचिव

हालाँकि पार्टी में विभाजन होने पर वह एक धड़े से दूसरे धड़े में ज़रूर चले गए.

जमाली सत्तर के दशक में ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो की कैबिनेट के सदस्य रहे और फिर जनरल ज़िया उल हक़ की सैन्य सरकार में राज्य मंत्री रहे.

अस्सी के दशक में मोहम्मद ख़ान जुनेजो की नागरिक सरकार के गठन के बाद जमाली जल और बिजली मंत्री बने.

वर्ष 1988 में उन्हें बलूचिस्तान प्रांत का कार्यवाहक मुख्यमंत्री बना दिया गया और दो वर्ष बाद उन्होंने प्रांतीय असेंबली को भंग कर दिया जिसको लेकर काफ़ी विवाद खड़ा हो गया.

1996 में बेनज़ीर भुट्टो की सरकार की बर्ख़ास्तगी के बाद जमाली को फिर बलूचिस्तान का कार्यवाहक मुख्यमंत्री बना दिया गया.

1997 के चुनाव के बाद वह इस्लामाबाद में सांसद बन गए.

जब पाकिस्तान मुस्लिम लीग नवाज़ का विभाजन हुआ तो वह मुशर्रफ़ समर्थक पीएमएल क्यू के महासचिव बना दिए गए.

मध्यमार्गी

उनके बारे में कहा जाता है कि वह दो निर्वासित प्रधानमंत्रियों, नवाज़ शरीफ़ और बेनज़ीर भुट्टो की वापसी के हिमायती हैं और देश के राजनीतिक जीवन में उनका सक्रिय योगदान चाहते हैं.

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पार्टी में भी उनकी छवि मध्यमार्गी की रही

उनके अलावा उनके दो अन्य रिश्तेदार बलूचिस्तान के मुख्यमंत्री रह चुके हैं.

उनके चाचा ज़फ़र जमाली फ़ातिमा जिन्ना के सहायक के तौर पर काम कर चुके हैं.

ज़फ़रुल्ला जमाली ने पंजाब में पढ़ाई की. पहले वह मरी के रॉयल कॉलेज में पढ़े और फिर लाहौर के ऐचिंसन कॉलेज में उन्होंने स्नातक की पढ़ाई की.

उन्होंने पंजाब यूनिवर्सिटी से स्नातकोत्तर डिग्री ली. जमाली विवाहित हैं और उनके तीन बेटे और एक बेटी है. उनके दो बेटे पाकिस्तानी सेना में अधिकारी है.

ज़फ़रुल्ला जमाली की खेल में काफ़ी रुचि रही है और कॉलेज के दिनों में वह हॉकी, क्रिकेट और वॉलीबॉल खेलते थे.

वह पाकिस्तान हॉकी संघ के अध्यक्ष रहे हैं और राष्ट्रीय हॉकी टीम के चयनकर्ता बोर्ड के सदस्य रहे हैं.

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