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मुशर्रफ़ के नेतृत्व में पाकिस्तान किस दिशा में बढ़ रहा है? | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
जब कई पाकिस्तानी ये सोच रहे थे कि राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ चुनी हुई सरकार और संसद को मज़बूत करेंगे, तब पाकिस्तान उल्टी दिशा में जाता नज़र आ रहा है. हाल में उठाए कई कदमों से पाकिस्तानी सेना ने वहाँ की लोकतांत्रिक व्यवस्था पर शिकंजा कस लिया है. जब पाकिस्तान आतंकवाद और इस्लामी कट्टरपंथ का सामना कर रहा है तब देश में राजनीतिक संकट पैदा हो गया है. हिचकिचाते हुए प्रधानमंत्री जफ़रुल्ला ख़ान जमाली संसद में 13 सदस्यों वाली राष्ट्रीय सुरक्षा समिति के गठन के लिए विधायक लाने को विवश हो गए जिससे देश में रणनीतिक नीति बनाने पर सेना का कब्ज़ा रहेगा. नेशनल असेंबली से जल्दबाज़ी में पारित करवाकर इसे 14 अप्रैल को क़ानून की शक्ल भी दे दी गई. विपक्ष के बहिष्कार के बीच, बिना किसी बहस के ये विधेयक केवल साढ़े तीन मिनट में ही पारित हो गया. राष्ट्रपति मुशर्रफ़ ने वर्दी उतारने यानि सेनाध्यक्ष का पद दिसंबर तक छोड़ने के बारे अपने वादे पर सवालिया निशान लगा दिया है.
माना जाता है कि जब उनके क़रीबी मंत्रियों ने उन्हें ये पद न छोड़ने का अनुरोध किया तो उन्होंने पूरे देश को इस बारे में असमंजस में डाल दिया. विरोध बर्दाश्त नहीं उधर विपक्ष के एक प्रमुख नेता जावेद हाशमी को सेना को विद्रोह करने पर उकसाने के आरोप में इस्लामाबाद की एक अदालत ने 23 साल की जेल की सज़ा सुनाई गई है. इससे ये संकेत गया है कि सेना किसी की ओर से विरोध को बर्दाश्त नहीं करेगी. उधर राष्ट्रपति मुशर्रफ़ मंत्रिमंडल की बैठकों में प्रधानमंत्री जमाली के साथ बैठते हैं और कई अन्य प्रशासनिक बैठकों की अध्यक्षता भी करते हैं. आम तौर पर इन विषयों और नीतियों पर मंत्रिमंडल को फ़ैसला करने का अधिकार होता है. प्रधानमंत्री जमाली की पाकिस्तान मुस्लिम लीग समेत पाकिस्तान में कई राजनीतिक नेता और वरिष्ठ अधिकारी हताश हैं. राष्ट्रपति मुशर्रफ़ ने विभिन्न प्रशासनिक पद संभालने वाले लगभग 600 अफ़सरों को हटाने से भी इनकार कर दिया है. माना जा रहा था कि पूर्व राष्ट्रपति ज़िया-उल हक़ की तरह सरकार के चुने जाने पर सैनिक अधिकारी अपने प्रशासनिक पद छोड़ देंगे. कुछ वरिष्ठ राजनयिकों का कहना है कि नीतिगत परिवर्तन करने में विदेश मंत्रालय की भूमिका न के बराबर है. हाल में भारत-पाकिस्तान संबंध सुधारने के समय विदेश मंत्रालय को पूरी प्रक्रिया से दूर रखा गया. अब चाहे राष्ट्रपति मुशर्रफ़ सेनाध्यक्ष का पद छोड़ दें लेकिन देश के राजनीतिक ढांचे में सेना को स्थायी भूमिका प्रदान की जा रही है. सेनाध्यक्ष का पद न छोड़ना क्या हिचकिचाहट का नतीजा है या फिर राष्ट्रपति मुशर्रफ़ सेना के भीतर से ख़ुद के लिए ख़तरा महसूस करते हैं? या फिर सेना ने ये मतलब निकाल लिया है कि प्रशासन चलाने के लिए आम नागरिकों पर भरोसा नहीं किया जा सकता है? सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि राष्ट्रपति मुशर्रफ का हाल में सक्रिय होना प्रधानमंत्री जमाली की असफलता दर्शाता है. कब तक मानेंगे जमाली? प्रधानमंत्री जमाली को सेना ने ही देश के प्रधानमंत्री पद के लिए 'चुना' था. अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों का मानना है कि 2002 के चुनावी नियम केवल बड़े राजनीतिक नेताओं और दलों को सत्ता से बाहर रखने के लिए बनाए गए. अब तक प्रधानमंत्री जमाली राष्ट्रपति मुशर्रफ़ की बात मानते आए हैं. इससे प्रधानमंत्री जमाली के समर्थक सहमत नहीं हैं और वे चाहते हैं कि संसद को और प्रभावशाली बनाया जाए. अमरीका की 'आतंकवाद के ख़िलाफ़' लड़ाई और हाल में हुई वज़ीरिस्तान में कार्रवाई में साथ देने से पाकिस्तानी फ़ौज में कुछ विरोध के स्वर उठे हैं. लेकिन सेना बहुत अनुशासित संस्था है और वह राष्ट्रपति मुशर्रफ़ के शासनकाल के दौरान प्रशासन में मिले नए पदों से काफ़ी ख़ुश है. पिछले कुछ हफ़्तों में राष्ट्रपति मुशर्रफ़ की सरकार ने इराक़ पर अमरीका की आलोचना की है और अमरीकी विदेश मंत्रालय की जावेद हाशमी मामले में लगाई फ़टकार को पाकिस्तान के मामलों में दख़ल बताया है. इसका ये मतलब नहीं कि पाकिस्तान ने कोई रणनीतिक बदलाव किया है, बल्कि घरेलू लोगों का समर्थन हासिल करने की कोशिश है क्योंकि पाकिस्तान में अमरीका विरोधी भावना बढ़ रही है. इसीलिए राष्ट्रपति मुशर्रफ़ ने कश्मीर और भारत के साथ रिश्तों पर भी तरह-तरह के बयान दिए हैं ताकि इस्लामी पार्टियों का समर्थन हासिल किया जा सके. सेना ने विपक्ष के साथ विभाजित करो और शासन कोर की नीति अपनाई है और विपक्षी दल अपनी आलोचना के बावजूद राष्ट्रपति मुशर्रफ़ के लिए कोई गंभीर ख़तरा नहीं हैं. ये भी हो सकता है कि राष्ट्रपति मुशर्रफ़ इस कोशिश में जुटे हों कि जब वे सेनाध्यक्ष का पद छोड़े तो सेना ऐसी स्थिति में हो कि वह राजनीतिक व्यवस्था पर पूरी तरह कब्ज़ा जमाए रखे. लेकिन इससे राजनीतिक स्थिरता बढ़ने वाली नहीं, न ही इससे आर्थिक तरक्की होगी और न ही इस्लामी कट्टरपंथ के ख़िलाफ़ लड़ाई में जनता का समर्थन मिलेगा. |
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