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केरल में इस बार है कांटे का मुक़ाबला | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अभी कुछ दिन पहले तक राजनीतिक पंडित केरल के चुनावी मुकाबले पर बहस करने से बचते थे. तब उनका तर्क होता था कि केरल के नतीजों में हैरान करने वाली कोई बात नहीं होनी है. बहुत हुआ तो दो-एक सीटें इधर से उधर जाएंगी, और उससे भी क्या फर्क पड़ना है क्योंकि ये सारे 20 सांसद तो संसद में एनडीए के ख़िलाफ ही खड़े होंगे. पर पिछले कुछ हफ्तों में केरल में काफी कुछ हुआ है और इससे दिलचस्पी बढ़ी है. चुनावी भविष्यवाणियों में कांग्रेस गठबंधन और एनडीए को बहुमत से कम सीटें मिलने की बात कही जा रही है तथा कांग्रेस-वामपंथी गठजोड़ की सरकार गठन में महत्वपूर्ण भूमिका मानी जा रही है. सो दिल्ली सरकार पर वाम मोर्चे का कितना और कैसा प्रभाव होगा इसमें वाममोर्चे को मिलने वाली सीटों सी संख्या महत्वपूर्ण होगी. इसे 50 तक पहुंचाने में केरल की भूमिका भी है. गठबंधन पूरे उत्तर भारत के विपरीत केरल में मतदाता एकदम इधर से उधर नहीं होते. हर चुनावों में वहां के सामाजिक और राजनैतिक संतुलन में हल्का-हल्का अंतर होता है.- फाइन ट्यूनिंग चलती है. सो चुनावी मुक़ाबले पर नजर डालने से पहले यहां की संतुलनकारी ताकतों को जान लेना ज़रूरी है. केरल में चुनावी मुकाबला मुख्तः कांग्रेस की अगुवाई वाले संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा और माकपा की अगुवाई वाले वाम लोकतांत्रिक मोर्चा के बीच है. लोकतांत्रिक मोर्चा में कांग्रेस के अलावा मालाबार के मुसलमानों पर अच्छी पकड़ रखने वाला मुस्लिम लीग, इसाई समूहों से जुड़े केरल कांग्रेस के दो धड़े भी हैं. वाममोर्चा में माकपा, भाकपा, रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी और कुछ स्वतंत्र उम्मीदवार हैं. जिन सीटों पर वाममोर्चा पारंपरिक रूप से कमजोर हैं उन पर वह स्वतंत्र उम्मीदवारों को समर्थन देता है. विधानसभा चुनाव में दोनों मोर्चे कुछ और छोटी पार्टियों को भी साथ ले लेते हैं पर लोकसभा में काफी समय से यही खेमेबंदी है और राज्य में पड़ने वाले मतों में से 90 फीसदी इन दोनों गठबंधनों की झोली में ही जाते हैं और इनका हिस्सा 40 फीसदी से थोड़ा ऊपर का रहता है. सो सात-आठ फीसदी वोट ही इधर या उधर जाकर नतीजों का पलड़ा झुकाते हैं. 1989 से भाजपा ने भी राज्य में पैर जमाने की कोशिशें तेज की हैं और उसे 5 से आठ फीसदी वोट मिले हैं पर अभी तक वह कोई सीट जीतने में सफल नहीं हुई है- न लोकसभा की न ही विधानसभा की. पर ऊपर से दिखने वाली इस बराबरी की जंग के पीछे राजनीतिक और सामाजिक ताकतों का बहुत ही नाज़ुक संतुलन है. समय से आगे अन्य काफी सारी चीजों की तरह केरल के लोग भी राजनीतिक घटनाक्रम का अनुमान लगा लेने में मुल्क से काफी आगे हैं.
केरल में सीटों का तालमेल 1950 के दशक में ही शुरू हुआ था और 1960 के दशक में तो यहां गठबंधन बन गए थे. इसमें कोई संदेह नहीं कि दो दशकों में राज्य में सारी राजनीतिक उठापटक चली पर यह सही है कि इसी दौरान लोगों ने सामाजिक बदलाव में राजनीति की असली भूमिका को भी ठीक से समझ लिया. लोकतांत्रिक मोर्चा और वाममोर्चा का मौजूदा स्वरूप 1980 में दशक में बना और बहुत थोड़े बदलावों के साथ अभी तक चल रहा है. बाक़ी मुल्क अभी भी केरल की तरह गठबंधन चलाने का गुर सीखने में ही व्यस्त है. 1990 में बाकी मुल्क को गठबंधन की राजनीति समझ में आई. जाति-समुदाय एक मामले में केरल बाक़ी मुल्क के लिए अपवाद नहीं है. सारी साक्षरता और राजनीतिक चेतना के बावजूद यहां जाति और समुदाय के आधार पर ही वोट पड़ता है. ठीक वैसे ही जैसे उत्तर प्रदेश-बिहार में होता है. दरअसल लोकतांत्रिक मोर्चा और वाममोर्चा का पूरा गणित ही जाति और समुदाय पर टिका है. केरल में अल्पसंख्यकों के दो बड़े समूह हैं. इसाइयों की आबादी 19 फीसदी है जबकि मुसलमान 23 फीसदी हैं. इसाइयों में भी बंटवारा है और वहां 'बड़ी जाति' और प्रभावी सीरियल समुदाय में लोकतांत्रिक मोर्चा को भारी समर्थन मिलता है, लगभग तीन चौथाई. शेष इसाइयों का वोट लगभग बराबर-बराबर दो हिस्सों में बंटता है और दोनों मोर्चों को मिलता था. मुसलमान मुख्यतः मालाबार में उत्तरी जिलों में हैं.
यहां की दो सीटों-मंजेरी और पोन्नानी तो मुसलमान बहुल ही है. मुसलमानों में भी जातिगत वर्गीकरण है, पर वोट के मामले में वे आमतौर पर एकजुट रहते हैं- वे कम्युनिस्टों को वोट नहीं देते. उनमें दो तिहाई से लेकर तीन चौथाई वोट लोकतांत्रिक मोर्चा को जाते हैं जिसमें मुस्लिम लीग शामिल है. बाबरी मस्जिद गिरने के वक्त कांग्रेसी सरकार केंद्र में थी सो उसे दोषी बताकर मुस्लिम लीग में और मुसलमानों में वैकल्पिक नेतृत्व बनाने की कोशिश हुई लेकिन सफल नहीं हो पाई. वाम मोर्चा को दोनों अल्पसंख्यक समुदायों को समर्थन न मिलने की बात स्वयं ईएमएस नंबूदरीपाद ने स्वीकार की थी. पर अब इसका व्यावहारिक मतलब यह होता है कि वाममोर्चे को शेष 60 फीसदी लोगों में से ही अपना मतदाता खोजना होता है. और इसी चलते केरल की चुनावी तैयारी और पश्चिम बंगाल की तैयारी में बहुत अंतर होता है. केरल में वाम मोर्चा को मुख्यतः उन दलित और पिछड़ी जातियों का समर्थन मिलता है. जिन्होंने समाज सुधार और आत्म सम्मान के आंदोलनों से अपनी स्थिति काफी अच्छी की है. उनके आंदोलनों से वामपंथियों ने भी अपना जुड़ाव किया. ऐसा सबसे बड़ा समूह है झझवा लोगों का जो पारंपरिक रूप से ताड़ी निकालने का काम करते रहे थे. इनकी आबादी प्रदेश में 22 फीसदी है और उनके दो तिहाई वोट वाम मोर्चा को मिलते हैं. अन्य पिछड़ी जातियों और 8 फीसदी दलितों में भी वाम मोर्चे को ज्यादा वोट मिलते हैं. ऊंची जाति के नायरों की आबादी लगभग 15 फीसदी है और वे आमतौर पर वाम मोर्चा के खिलाफ होते हैं. हाल के चुनावों में भाजपा को इसी समुदाय का समर्थन सबसे ज्यादा मिला है. फिर वायसनाड की पहाड़ियों में थोड़े से आदिवासी हैं पर उनकी संख्या इतनी नहीं है कि वे राज्य की राजनीति को ज्यादा प्रभाविक कर पाएं. इस बार उनकी बदहाली पर मुल्क का ध्यान खींचने के लिए ही प्रमुख आदिवासी कार्यकर्ता सी.के.जानू चुनाव लड़ रही हैं. यह कहा जा सकता है कि केरल के मतदान में सिर्फ जाति समुदाय ही नहीं धर्म भी आधार रहता है. कमजोर लोगों का झुकाव स्पष्टतः वाम मोर्चे की तरफ होता है. पर ऐसा समर्थक सामाजिक जातीय समूहों की आर्थिक स्थिति से भी जुड़ा है. मज़बूत समीकरण केरल में मतदान का यह मोटा समीकरण अब काफ़ी मजबूत हो गया है और यहां की स्थिति काफी कुछ पश्चिम के लोकतांत्रिक मुल्कों की तरह हो गई है. इससे 'सुरक्षित' और 'मुक़ाबले वाली' सीटों की भविष्यवाणी आसान हो जाती है. पर इससे मुकाबले में उतरने वाले दोनों के खेमों के लोग चैन से नहीं बैठ सकते. बल्कि केरल में मुकाबला अन्य किसी भी राज्य से ज़्यादा तीखा होता है. चूंकि बहुत कम अतिरिक्त वोटों को अपनी ओर मोड़ने की राजनीति होती है इसलिए सब जी-जान लगा देते हैं. भारत के किसी भी राज्य की तुलना में केरल में मतदान के रुझान में हल्का बदलाव भी चीजों में सबसे ज्यादा फर्क ला देता है. किसी भी खेमें से या जाति-समुदाय के सामान्य रुझान से ऊपर होकर मत डालने वाले थोड़े से 'फ्लोटिंग' वोटरों की लड़ाई भी काफी दिलचस्प होती है और वही राष्ट्रीय और स्थानीय मुद्दों को ढंग से चर्चा में ला देती है. ऊंची जाति के पढ़े-लिखे लोगों या फिर दलितों में ही ऐसे 'फ्लोटिंग वोटर' ज्यादा हैं. फिर केरल का मतदाता राज्य और केन्द्र के चुनाव का फर्क़ जानता है और यही कारण है कि अक्सर लोकसभा चुनाव में लोकतांत्रिक मोर्चे को हल्की बढ़त रहती है. वहां बड़ा और असली खिलाड़ी न होने के चलते वाममोर्चा कुछ पिछड़ जाता है. कांग्रेस रक्षात्मक पर इस बार कांग्रेसी अभियान रक्षात्मक तरीके से शुरू हुआ क्योंकि करुणाकरण बनाम एंटनी की लड़ाई से कांग्रेसी परेशान थे.
करुणाकरण की बेटी और बेटा को टिकट का जुगाड़ करके कांग्रेस ने कैसे भी इस विवाद को तो संभाल लिया पर पार्टी को परेशानी हुई. करुणाकरण की बेटी पद्मजा मुकुंदपुरम से और बेटा मुरलीधरन वडक्कनपेरी विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस के उम्मीदवार हैं. अब उनकी जीत-हार करुणाकरण का कद तय करेगी, पर यह विवाद बढ़ता तो कांग्रेस को ज्यादा परेशानी होती. और अब वाममोर्चा इस विवाद को चुनावी मुद्दा नहीं बना पा रहा है. वह अब राज्य सरकार की असफलताओं को मुद्दा नहीं बना पा रहा है. वह अब राज्य सरकार की असफलताओं को मुद्दा बना रहा है. कांग्रेस भाजपा के विकल्प के तौर पर खुद को पेश कर रही है. इसका उसे फायदा है. पर वाम मोर्चा यह शिकायत कर रहा है कि कांग्रेस की कमजोरी ने भी भाजपा को बढ़ाया है. भाजपा की कोशिश भाजपा प्रदेश में अपना खाता खोलने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है. लालकृष्ण आडवाणी की भारत उदय यात्रा को यहां अच्छा समर्थन मिला. चुनाव सर्वेक्षण भी बताते हैं कि भाजपा इस बार आठ फीसदी वोट पाने के अपने रिकार्ड को सुधार सकती है, पर वह सीट पाएगी या नहीं यह साफ नहीं है. भाजपा ने त्रिवेंद्रम और कसारगोड में अच्छा प्रदर्शन किया तो राज्य के दक्षिणी और उत्तरी छोर पर हैं, त्रिवेंद्रम में उसे पिछली बार 20 फीसदी वोट मिले थे. केन्द्रीय मंत्री ओर राजगोपाल यहां से चुनाव लड़ रहे हैं और उन्हें उम्मीद है कि इस बार उन्हें 30 फीसदी से ज्यादा वोट मिलेंगे. ऐसा हुआ तो भाजपा के लिए सीट जीतने का अवसर भी हो सकता है क्योंकि मुकाबला त्रिकोणीय है. पहले भाजपा ने वाम मोर्चा से ज्यादा दुश्मनी के चलते अपने वोट लोकतांत्रिक मोर्चे के पक्ष में डलवाए थे. इस बार संभव है कि भाजपा को पैर न जमाने देने के लिए वाममोर्चा और लोकतांत्रिक मोर्चा कहीं कहीं अपने वोटों का आदान-प्रदान करें. कांटे की लड़ाई भाजपा का चाहे जो हो, राज्य में बहुत ही कांटे की लड़ाई चल रही है. और त्रिवेंद्रम तथा मुवातुपुझा को छोड़कर बाकी सभी स्थानों पर सीधा मुकाबला है. दोनों पक्षों में पिछला मुकाबला लगभग बराबरी का था पर इस बार वाम मोर्चा को ज्यादा परेशानी लगती है. अगर उसके एक फीसदी वोटर भी लोकतांत्रिक मोर्चा की तरफ गए तो उसकी पांच सीटें खिसक जाएंगी. अगर दो फीसदी का रुझान उधर बढ़ा तब राज्य की सभी 20 सीटें लोकतांत्रिक मोर्चा की स्थिति इतनी नाजुक नहीं है. उसके तीन फीसदी वोटर दूसरी तरफ जाएंगे. तब उसे पांच सीटों का नुकसान होगा. अगर पांच फीसदी 'स्विंग' भी उसके खिलाफ हुआ तब भी वह अपनी कुछेक सीटें बचा ले जाएगा. पर ऐसे मुकाबला में भविष्यवाणी करना मुश्कल काम है. |
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