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बहुकोणीय मुक़ाबलों वाली दिलचस्प 80 सीटें | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
उत्तरप्रदेश की चुनावी लड़ाई को दो तरह से देखा जा सकता है - एक तो विशुद्ध चुनाव शास्त्र वाले नज़रिए से आंकड़ों, स्विंग और मतों के बंटवारे के आधार पर सीटों का हिसाब-किताब लगाना है. या फिर जाति और समुदाय के गणित को देखना जो कि चुनावी नतीजों को तय करने में काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. ये दोनों तरीक़े एक दूसरे के प्रतिद्वंद्वी और उलटे हैं, यह मानना ग़लत है. स्विंग या वोटों का बंटवारा हवा में या अकारण नहीं होता. इनका वोटरों की पसंद, दलों की लोकिप्रयता घटने-बढ़ने से सीधा रिश्ता है. और इस बात को समझना ख़ासतौर से ज़रूरी है क्योंकि चुनाव की जो ब्रिटिश प्रणाली हमने अपनाई है उसमें किसी दल को मिलने वाले वोट और सीटों में कोई प्रत्यक्ष रिश्ता नहीं है. ऐसे में चुनाव पंडित वाला ज्ञान वोट और सीटों के रिश्ते को समझने में मदद करता है. लेकिन इस रुख़ में वोटरों की समझ, उनके फैसलों को प्रभावित करने वाले वास्तविक कारणों की समझ और समाज की समझ से काफी मदद मिलती है. उत्तर प्रदेश की चुनावी लड़ाई को समझने के लिए हमें इस चीज की ख़ास ज़रूरत है. सो आइए पहले विशुद्ध चुनाव शास्त्र वाले हिसाब से शुरुआत करें और फिर इस राज्य की जटिलताओं को कुछ हद तक समझने के लिए सामाजिक और राजनीतिक पहलुओं पर ग़ौर करेंगे. बहुकोणीय मुक़ाबले का गणित पिछले चार चुनावों के नतीजों पर एक नज़र डालते ही हमें यह पहला पाठ मिलता है कि अगर चुनाव बहुकोणीय हो तो हमारी चुनाव व्यवस्था सबसे बड़े दल को बहुत ज़्यादा लाभ दे देती है.
1991 की अयोध्या लहर के साथ ही उत्तर प्रदेश की राजनीति में भाजपा का प्रभुत्व बन गया. तब उसे राज्य की सीमा वाली 80 सीटों (तब पांच और सीटें भी उत्तर प्रदेश में थीं जो अब उत्तरांचल में चली गई हैं) में से 50 पर जीत मिली थी. लेकिन वोटों में उसे इतनी भारी बढ़त नहीं थी. तब उसे लगभग एक तिहाई वोट ही मिले थे. 1998 में उसके वोट 37 फीसदी हो गए जो अभी तक का रिकार्ड है. अगर सीधे मुक़ाबले की स्थिति हो तो इतने वोट में कोई भी पार्टी एकदम मिट जाएगी. लेकिन इतने वोटों से भाजपा ने उत्तर प्रदेश की लगभग दो तिहाई सीटें जीत ली थीं. भाजपा की इस सफलता की असली कुंजी है उत्तर प्रदेश की राजनीति के बिखराव में, जो 1990 के दशक में आई. 1991 की पराजय के बाद कांग्रेस एकदम पस्त हो गई और उसके वोटों का हिस्सा दस फीसदी से भी नीचे चल गया. लेकिन उसकी जगह किसी एक दल ने नहीं ली. अधिकांश क्षेत्रों में बहुकोणीय मुक़ाबला हुआ और अलग-अलग दलों ने कांग्रेसी वोट बैंक के अलग-अलग हिस्सों के बल पर चुनाव लड़ा. भाजपा को 32 के 37 फीसदी वोट मिले जो उसके राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों से दस फीसदी ज़्यादा रहा. और इतना फासला उसे राज्य में बहुमत से ज़्यादा सीटें जितवाने के लिए पर्याप्त रहा. 'बेकार' वोट चुनाव-शास्त्र की भाषा में कहें तो उत्तर प्रदेश में विपक्षी एकता का ‘इंडेक्स ’ काफी नीचे रहा.
हमारी चुनावी प्रणाली में जीते पक्ष के वोटों के अलावा काफी सारा वोट ‘बेकार’ हो जाता है. विपक्षी तालमेल या एकता न होने से उत्तर प्रदेश में ‘बेकार’ होने वाले मत ही काफ़ी थे और कम वोट पाकर भी भाजपा ज़्यादा सीटें जीत लेती थी. 1999 में लोकसभा चुनाव में यह स्थिति बदली. इसकी वजह ग़ैर भाजपा दलों में एकता न होना थी. (वैसे उस चुनाव में राष्ट्रीय लोकदल से गठबंधन करने के चलते कांग्रेस को कुछ लाभ हुआ) ऐसा बदलाव भाजपा की लोकप्रियता में गिरावट के चलते आया. भाजपा को सिर्फ 27 फीसदी वोट मिले और अब प्रतिद्वंद्वी दलों से उसकी बढ़त एक-दो फीसदी रह गई. समाजवादी पार्टी और बसपा, दोनों के वोट बढ़े पर सीटों में ज्यादा लाभ सपा को हुआ. भाजपा को सभी जगह वोट मिले जबकि सपा के वोट कुछ ख़ास इलाकों में केन्द्रित थे. इसी चलते वोटों के मामले में भाजपा से कुछ पीछे रहते हुए भी सपा को उससे ज़्यादा सीटें मिलीं. भाजपा अब हमारी चुनावी प्रणाली का तर्क भाजपा के ख़िलाफ़ जाना शुरु हो चुका था. उसके बाद से भाजपा की गिरावट जारी है. अपनी राज्य सरकार के घटिया कामकाज के चलते 2002 के विधानसभा चुनावों में उसका प्रदर्शन काफी खराब रहा. उसे सिर्फ 25 फीसदी वोट मिले. तब राष्ट्रीय लोकदल उसके साथ था. उसे दो फीसदी वोट मिले थे. इस बार भी सपा का वोट कुछ खास इलाकों में केन्द्रित रहा और इसका लाभ उसे मिला. उसने विधानसभा की सबसे ज़्यादा सीटें जीतीं. अब लोकदल भाजपा का साथ छोड़कर सपा के साथ है. इस कमी को पूरा करने के लिए भाजपा ने कल्याण सिंह को प्रदेश की कमान सौंपी है जिनके राष्ट्रीय क्रांतिदल ने पिछले चुनावों में भाजपा को काफी नुकसान पहुंचाया था. इस प्रकार लोकसभा चुनाव का परिदृश्य पिछले विधानसभा चुनाव से क़ाफ़ी बदल चुका है. और यह चीज भाजपा के लिए ज्यादा चिंता पैदा करती है. अगर विधानसभा वाला हिसाब ही लोकसभा चुनाव में चल जाए तो मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी को 39 सीटें मिल जाएंगी. कल्याण सिंह के साथ आने के शायद कुछ फर्क़ पड़े. पर यह सिर्फ आंकड़ों का हिसाब है. असलियत में अब भाजपा सिर्फ दो ही तरीकों से 1999 की अपनी सीटों में बढ़ोत्तरी कर सकती है. वोटों का बंटवारा पहला तो सीधे-सीधे ज़्यादा वोट पाना. और फिर सीटें पाने का तरीका है कि अगर उसे पहले से दो फीसदी ज़्यादा वोट मिले तो उससे सीटों की संख्या 36 हो जाएगी, अर्थात 11 सीटों का फ़ायदा होगा. चुनाव के शुरुआती दौर में यह चीज़ संभव लगती भी थी. अब न तो भाजपा यह दावा करती है, न ही इस बात की संभावना नजर आती है. सो अब भाजपा के लिए दूसरा तरीक़ा है, अपने सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी के वोट को ज्यादा न बढ़ने देना. अगर सपा को पहले से दो फीसदी भी ज्यादा वोट मिले तो उसके सीटों की संख्या 40 हो जाएगी और वह राष्ट्रीय राजनीति में नई ताकत से उभरेगी.
भाजपा को इससे ज़्यादा नुकसान होगा. भाजपा इस स्थिति को किसी भी तरह टालना चाहेगी. सो भाजपा की मौजूदा चुनावी रणनीति में विपक्षी वोटों का बंटवारा कर देना प्रमुख है. ऐसे में कांग्रेस का फिर से उभरना भाजपा को लाभ पहुंचा सकता है. अभी तक कांग्रेस के वोटों का प्रतिशत उसे उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति में निर्णायक स्थिति में नहीं रखे हुए था. जब तक उसे 14 फीसदी वोट नहीं मिलते वह मुख्य मुकाबले में नहीं आएगी और निजी प्रभाव लाले सीटों को छोड़कर बाक़ी पर खास असर नहीं डाल सकेगी. अगर उसके पक्ष में चार फीसदी और वोट आए तो भी उसे कोई अतिरिक्त सीट नहीं मिलेगी. छह फीसदी वोट बढ़ने पर जरूर उसे चार सीटों का लाभ हो सकता है. पर जैसे ही कांग्रेस 20 फीसदी की सीमा के ऊपर निकलेगी उसके वोट दनादन सीटों की बढ़त में तब्दील होने लगेंगे. भाजपा यह चाहेगी कि कांग्रेस 20 फीसदी पर आकर रुक जाए और सपा-बसपा भी इसी के आसपास रहे जिससे उसे अपने प्रतिद्वंद्वियों पर कम वोट प्रतिशत से भी निणार्यक बढ़त मिल जाए. पर यह धुर आशावादिता है. उत्तरप्रदेश जैसे राज्य में चौकोने मुकाबले की स्थिति में किसी एक राय को निर्णायक बढ़त मिलने की संभावना नहीं है. इस स्थिति से भाजपा थोड़ा सांत्वना भर पा सकती है. पर एक ख़ास चीज़ का ध्यान रखना ज़रूरी है. यहां पूरे प्रदेश के स्तर पर मोटी-मोटी बातें कही गई हैं. बिखराव की स्थिति बारीक स्तर पर होने वाली दो चीजें सारी तस्वीर बदल सकती है.
यह स्थिति बहुत दुर्लभ मामलों में ही होती है क्योंकि सामान्य मतदाता न तो जीत-हार की अटकल लगा पाने में ज्यादा सक्षम होता है न ही किसी एक दल के उम्मीदवार से उसकी इतनी नाराजगी होती है. बल्कि इससे उल्टी स्थिति भी संभव है. संभव है कि भाजपा को ज्यादा वोट न मिलें पर निचले स्तर पर वोटरों का बिखराव पैदा करके वह अपनी पराजय को विजय में बदल सकती है, जैसा कि राजस्थान विधानसभा चुनाव में उसने किया भी था. भाजपा की सांगठनिक शक्ति और क्षमता को देखते हुए इस संभावना को खारिज नहीं किया जा सकता. पर इससे राज्य की वह तस्वीर पूरी तरह नहीं बदलती जिसकी चर्चा हमने ऊपर विस्तार से की है. |
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