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दिलचस्प है छपरा की चुनावी टक्कर | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
छपरा में चुनावी टक्कर पर सबकी नज़र है. एक ओर हैं राष्ट्रीय जनता दल नेता लालू प्रसाद यादव तो दूसरी ओर नागरिक उड्डयन मंत्री और भाजपा नेता राजीव प्रताप रूड़ी को अपनी सीट बचानी है. विपक्षी खेमा उन्हें 'हवा हवाई' बुलाता है. उनका आरोप है कि 'ये शहरी बाबू कभी छपरा के लोगों से मिला नहीं, उनका इन्होंने दुख दर्द सुना नहीं.' छपरा में समस्याएँ कई हैं. बेरोजगारी के चलते यहां से पलायन बड़ी संख्या में होता है, बाढ़ से खेती हर साल नष्ट होती है. हालांकि रूड़ी अपने कार्यों की लंबी फेहरिस्त पेश करते हैं. मसलन टेलीमेडिसिन सेंटर, झींगा की खेती और निर्यात, सात सौ करोड़ की रेल-पुल परियोजना पर कार्य, कई एबुलेंस चलाना, स्कूल खोलना. वहीं राष्ट्रीय जनता दल का कहना है कि रूड़ी ने क्षेत्र के लिए कोई काम नहीं किया. उनका कहना है कि क्षेत्र से न भय, न भूख और न ही भष्ट्राचार मिटा. लालू यादव पहली बार यहाँ से 1977 में और फिर 1979 में भी चुनाव जीते थे. राजीव प्रताप रूड़ी कहते हैं कि, ''इस बार हम अच्छी स्थिति में हैं. इससे बौखला कर प्रशासन मतदाताओँ को धमका रहा है.'' ''लालू प्रसाद के पास प्रशासन और तंत्र है, प्रशासक उनके हैं और जिस तरह वे पैसे का उपयोग कर रहे हैं, प्रशासन तंत्र का उपोयग कर रहे हैं, मेरे हिसाब से वे हर तरीका जो वोटर को भतभीत करने का है उसका इस्तेमाल कर रहे हैं." पिछली बार रूड़ी को अपने प्रतिद्वंद्वी से महज पाँच प्रतिशत अधिक वोट मिले थे. जातीय समीकरण जानकारों का कहना है कि सारा खेल जातीय समीकरण पर निर्भर करता है.
यहाँ सवा तीन लाख यादव, दो लाख,30 हजार राजपूत, 90-90 हजार भूमिहार और मुस्लिम मतदाता, दो लाख दलित और दो लाख अन्य पिछड़ी जातियों के मतदाता है. छपरा के ग्रामीण क्षेत्र की जनता की इस बारे में मिलीजुली प्रतिक्रिया है. लोगों ने कहा, "हम वाजपेयी के नाम पर वोट दे रहे हैं और प्रशासन यहाँ बहुत विरोध कर रही है." "भाजपाई बूथ लूटने की बात कर रहे हैं पर ये ही पिछड़ी जातियों को वोट नहीं डालने देंगे." "हमने पिछली बार रूड़ी की मदद की थी पर वे आए नहीं इसिलए उसका साथ नहीं देंगे." "यहां फीलगुड का कोई प्रभाव नहीं, बस लालू जी का प्रभाव है." इसी के मद्देनज़र मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने कल यहाँ रोड शो किया, तो वाजपेयी जनसभा करने पहुंचे. टीकाकारों का कहना है कि राजीव प्रताप रूड़ी को सीट बचाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाना पड़ेगा क्योंकि अगर जातीय समीकरण को देखें तो लालू यादव की स्थिति कागज़ पर तो मजबूत दिखती है. हालांकि जनता अपने पत्ते 26 अप्रैल को खोल इन नेताओं के भाग्य का फैसला करेगी. |
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