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शुक्रवार, 16 अप्रैल, 2004 को 15:28 GMT तक के समाचार
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विस्थापित मुस्लिमों का मताधिकार

गुजरात के मुसलमान
गुजरात के दंगों के बाद मुसलमान बड़ी संख्या में विस्थापित हुए हैं
मध्य गुजरात का आणंद शहर अब 2002 के दंगों में विस्थापित मुसलमानों का शहर बन गया है.

ये लोग अब तक अपने गाँव नहीं लौट पाए हैं और इनके मताधिकार को लेकर सैकड़ों सवाल खड़े हो गए हैं.

ग़ौरतलब है कि चुनाव को अब कुछ दिन ही बाकी हैं लेकिन इन लोगों की तरफ़ कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी, दोनों ही ध्यान नहीं दे रहे हैं.

इन लोगों को यह भी नहीं मालूम है कि इन्हें अपने गाँव जाकर वोट देना है या फिर एक विशेष बूथ में इनसे मतदान कराया जाएगा.

लोग इस बात को लेकर ख़ासे चिंतित हैं कि उन्हें पोलिंग बूथ तक सुरक्षित कौन ले जाएगा. ये लोग अभी तक भतभीत हैं और भय की वजह से ये लोग विशेष बूथ पर जाकर वोट नहीं डालना चाहते.

ऐसे ही एक विस्थापित अयूब बोहरा ने बताया, "हम लोगों को वोट देने से डर लगता है क्योंकि हम पर राजनीतिकों का यह पहरा रहेगा कि हमने वोट किसे दिया है. हम लोगों को वो ऐसे भी सताते हैं, फिर ज्यादा सताएँगे."

जब कुछ विस्थापित मुसलमानों से पूछा गया कि इस चुनाव से वो क्या चाहते हैं तो उन्होंने बताया कि सबसे पहले तो उनकी जो परेशानी है, वो खत्म होनी चाहिए.

दूसरा यह कि सरकार कोई भी आए लेकिन जैसे अभी हिंदुओं का भला हो रहा है, वैसे ही हमारा भी भला होना चाहिए.

इन्हीं में से एक महिला शबीना ने कहा, "हम भारत के नागरिक हैं. इस वजह से हम वोट ज़रूर देना चाहते हैं."

आणंद सीट पर मुकाबला कांग्रेस के भरत सोलंकी और भाजपा के जयप्रकाश पटेल के बीच है.

उदासीनता

अल्पसंख्यकों के मुद्दे पर कांग्रेसी नेता पीसी पटेल का कहना है, "इनमें बेरोज़गारी इतनी ज़्यादा है कि गुजरात में भी भविष्य में आतंकवाद की स्थिति पैदा हो सकती है."

 हम लोगों को वोट देने से डर लगता है क्योंकि हम पर राजनीतिकों का यह पहरा रहेगा कि हमने वोट किसे दिया है
अयूब बोहरा

उन्होंने कहा, "राज्य सरकार को इन लोगों की रोजी-रोटी का जुगाड़ करना चाहिए वरना ये लोग अपने जीने के लिए कुछ भी कर सकते हैं."

उन्होंने कहा कि यदि केन्द्र में उनकी सरकार बनती है तो मुस्लिम लोगों को प्राथमिक शिक्षा दी जाएगी और राष्ट्रीय बैंकों से लोन की भी व्यवस्था की जाएगी.

दूसरी तरफ़ भाजपा का भी इन विस्थापितों के लिए कुछ ख़ास कार्यक्रम नहीं है. पार्टी नेता ख़ैराती लाल अरोड़ा ने कहा, "ऐसा कोई मुद्दा हमारे सामने अभी तक तो नहीं आया है, अटल बिहारी वाजपेयी ने भी अल्पसंख्यकों को साथ लेने की बात कही है."

दोनों ही पार्टियां फिलहाल अपने राष्ट्रीय मुद्दों पर ही प्रचार कर रही हैं.

स्थानीय तौर पर सहकारी बैंक का मुद्दा उभर कर आया है पर इस मुद्दे से इन मुसलमानों को कुछ लेना-देना नहीं है और चुनाव में उनकी स्थिति को लेकर कोई सुगबुगाहट नहीं है.

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