BBCHindi.com
अँग्रेज़ी- दक्षिण एशिया
उर्दू
बंगाली
नेपाली
तमिल
मंगलवार, 13 अप्रैल, 2004 को 17:06 GMT तक के समाचार
मित्र को भेजेंकहानी छापें
महाराष्ट्र में 'ब्रांड' हैं शिवाजी

शिवसेना कार्यकर्ता
शिवसेना को यक़ीन था कि वह शिवाजी की विरासत पर एकाधिकार जमा सकती है
'भंडारकर रिसर्च इंस्टीट्यूट' पर हुए हमले ने महाराष्ट्र के राजनीतिक हलकों में 'शिवाजी का असली उत्तराधिकारी कौन' का सवाल गर्म कर दिया है.

शायद यही वजह है कि सभी राजनीतिक दलों ने इस घटना के विरोध में अब तक कुछ नहीं कहा है.

दिलचस्प बात तो यह है कि शिवाजी के नाम पर 'भंडारकर रिसर्च इंस्टीट्यूट' पर हमला करने वाले ये लोग शिव सैनिक नहीं थे बल्कि 'मराठा सेवा संघर्ष' और 'संभाजी ब्रिगेड' के सदस्य थे और इनकी इस हरकत को न तो राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी-कांग्रेस गठबंधन और न ही शिवसेना-भाजपा ग़लत ठहरा रही है.

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी-कांग्रेस गठबंधन की राज्य सरकार ने तो इंटरपोल से संपर्क किया है और लेखक जेम्स लेन को गिरफ्तार कर राज्य में लाने को कहा है.

शिवाजी बने 'ब्रांड'

उल्लेखनीय है कि पुणे स्थित 'भंडारकर रिसर्च इंस्टीट्यूट' पर इसी साल पाँच जनवरी को कुछ लोगों ने धावा बोलकर संपत्ति को नुक़सान पहुँचाया था.

 शिवसेना नेता बाल ठाकरे जिस शिवाजी की बात करते हैं वह शिवाजी एक 'किंगडम बिल्डर' हैं यानी साम्राज्य बनाने वाले और ठाकरे शायद अपने आप को शिवाजी के रूप में देखते हैं. जैसे यशवंत राव चौहान भी देखा करते थे, जैसे शरद पवार भी सोचते हैं
टीकाकार दिलीप चित्रे

हमलावरों का कहना है कि अमरीकी लेखक जेम्स लेन की पुस्तक 'शिवाजी महाराज- इस्लामी भारत का हिंदू राजा' में शिवाजी के लिए कई विवादित और आपत्तिजनक बातें लिखी गई हैं इसीलिए ये विरोध किया गया.

इस बारे में जेम्स की इस संस्था ने मदद की थी.

टीकाकार दिलीप चित्रे इसे 'ब्रांड शिवाजी' की लड़ाई मानते हैं.

उन्होंने कहा, "शिवसेना नेता बाल ठाकरे जिस शिवाजी की बात करते हैं वह शिवाजी एक 'किंगडम बिल्डर' हैं यानी साम्राज्य बनाने वाले और ठाकरे शायद अपने आप को शिवाजी के रूप में देखते हैं. जैसे यशवंत राव चौहान भी देखा करते थे, जैसे शरद पवार भी सोचते हैं."

चित्रे का कहना है, "हर मराठा को ऐसा लगता है कि अगर वो सियासत में है तो उसकी बुनियाद, शिवाजी का नाम और शिवाजी के साथ जुड़ी हुई सारी चीज़ें होंगी. मतलब शिवाजी- ऐज़ ए ब्रांड और यह ब्रांड-युद्ध है."

अलग-अलग ब्रांड के लोग, जिनके ब्रांड अलग हैं, विचारधारा अलग है, इस ब्रांड को हथियाना चाहते हैं.

एक समय तो शिवसेना को ये पूरा यक़ीन था कि शिवाजी की विरासत पर वह एकाधिकार जमा सकती है और उसका उदय मुंबई के बाहर भी शिवाजी के नाम पर राजनीति करके हो सकता है.

लेकिन शिवसेना के वरिष्ठ नेता नारायण राणे बताते हैं कि अगर पार्टी बढ़ी है तो ज़मीन पर अपने काम से.

उन्होंने बताया कि 1985 के बाद से शिवसेना के कार्यकर्ता पूरे महाराष्ट्र के हर ज़िले, तालुका और गांव-गांव तक काम कर रहे हैं.

जेम्स लेन
जेम्स लेन की शिवाजी पर लिखी पुस्तक पर विवाद को पर्यवेक्षक 'ब्रांड शिवाजी' की लड़ाई मानते हैं

राणे के मुताबिक शिवसेना की पहचान एक काम करने वाली पार्टी, आम लोगों को न्याय दिलाने वाली पार्टी और जहां अन्याय होता है, उस वक्त अन्याय के ख़िलाफ़ आंदोलन करने वाली पार्टी, के रूप में है.

शिवसेना ने फैलाया आधार

शिवसेना ने पहले 'मुंबई सिर्फ़ मुंबईकरों के लिए' की बात कही लेकिन उसके बाद जब शहर से बाहर बढ़ने की योजना तैयार हुई तो पार्टी ने 'डायरेक्ट ऐक्शन' यानि सीधे-सीधे कार्य करने के तरीकों से युवाओं को इस तरफ आकर्षित किया.

टीकाकार दिलीप चित्रे बताते हैं कि जिन मराठा दलितों और विशेष रूप से पिछड़ी जातियों को कांग्रेस के राज में आगे बढ़ने का मौका नहीं मिला, वे सेना से जुड़ने लगे.

अब अहम सवाल ये है कि इस जनाधार बढ़ाने के झगड़े में कहीं शिवाजी का महत्व तो कम नहीं हुआ है.

पर्यवेक्षक मानते हैं कि इस नाम में अभी भी बहुत दम है और अगर उदाहरण के रूप में 'भंडारकर रिसर्च इंस्टीट्यूट' पर हुए हमले को ही देखा जाए तो अब अन्य लोग भी शिवाजी का नाम लेंगे, क्योंकि दोनों गठबंधनों के काम करने के अंदाज़ और नीतियों से लोग बहुत परेशान हैं.

लोग परेशान हैं

टीकाकार जयदेव ढोल के मुताबिक "पिछले 10 साल से वैश्वीकरण के ज़माने में सरकार का जो फैलाव था वो सिकुड़ता चला गया. खेती अच्छी नहीं हो रही, चीनी मिलें बंद होती जा रही हैं, रोज़गार नहीं मिल रहा, सरकार से कुछ काम नहीं मिल रहा."

ढोल के अनुसार, "इसके चलते आम लोग एक घुटन महसूस कर रहे हैं और उसके मन में जो संताप था, वही जेम्स लेन के विषय में देखने को मिला. लेकिन उसके जो रोज़गार के, शिक्षा के सवाल हैं, उस पर कोई नहीं बोल रहा है. न भाजपा के लोग बोल रहे हैं और न एनसीपी और कांग्रेस के लोग बोल रहे हैं."

देखने में आया है कि दोनों गठबंधन जब विपक्ष में रहते हैं तो तत्कालीन नीतियों का विरोध करते हैं और सरकार में आते ही पलट जाते हैं.

चाहे वो एनरॉन का मामला हो या नई आर्थिक नीतियों का.

अब देखना यह है कि इस बार मतदाता किस पर विश्वास करता है.

इससे जुड़ी ख़बरें
सुर्ख़ियो में
मित्र को भेजेंकहानी छापें
मौसम|हम कौन हैं|हमारा पता|गोपनीयता|मदद चाहिए
BBC Copyright Logo^^ वापस ऊपर चलें
पहला पन्ना|भारत और पड़ोस|खेल की दुनिया|मनोरंजन एक्सप्रेस|आपकी राय|कुछ और जानिए
BBC News >> | BBC Sport >> | BBC Weather >> | BBC World Service >> | BBC Languages >>