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बक्सर में ख़त्म हुआ कारवाँ का सफ़र | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बीबीसी हिंदी का कारवाँ अपने आख़िरी पड़ाव पर था बक्सर में. बीबीसी के पूरे कारवां के दौरान हर जगह मंच था लोगों का....लोगों के पास पूछने के लिए थे ढेरों सवाल....और निर्धारित थे विषय जिन पर लोगों ने जम कर दिए जवाब. बक्सर में विषय था अनेक मगर एक ? बहस शुरू की विद्यार्थी अभिषेक कुमार सिन्हा ने. अपने सवाल से- “हम एक कैसे रहें जब हमें नेता लोग ही एक नहीं रहने देते हैं, भड़काते रहते हैं ?” सवाल उठाए लोगों ने और जवाब भी उन्हीं के थे. नेताओं के अलावा शिक्षा से लेकर ग़रीबी तक कारण बने एकता में अनेकता के. वहीं कुछ को इसकी वजह बेरोज़गारी भी दिखी.
और तभी लोगों के बीच से ही एक आवाज़ आई....ये टिप्पणी कम और सवाल ज्यादा था. मंच पर मौजूद मनोज ने पूछा—“आख़िर कितने देश हैं दुनिया में, जो हमारी तरह गौरव कर सकते हैं, अनेकता में भी एकता के मिसाल दे सकते हैं” इस सवाल पर प्रेम भूषण चंद्र उपाध्याय ने ठीक उसी तरह बात लपकी जिस तरह क्रिकेटर मोहम्मद कैफ़ गेंद को लपकते हैं. प्रेम भूषण की मिसाल बनी भारतीय क्रिकेट टीम-“ भारतीय टीम में तो अनेक राज्यों के खिलाड़ी हैं, फिर भी लक्ष्य सामने हो तो वो एक होकर कैसे जीत जाते हैं?” संदेश सीधा था- राष्ट्रीय एकता लक्ष्य होना चाहिए. खुलें मंच पर लोगों ने दूसरों की केवल आलोचना ही नहीं की...बल्कि पीठ भी थपथपाई.....कसीदे तो पढ़े लेकिन उपलब्धियों को गिनवाने में भी पीछे नहीं रहे. |
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