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मंगलवार, 23 मार्च, 2004 को 20:57 GMT तक के समाचार
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कितनी मुश्किल से पहुँचे मंज़िल तक

जहानाबाद में कारवाँ
लोगों ने कारवाँ में उत्साह से हिस्सा लिया
बीबीसी के कारवाँ के अब तक के सफ़र में मैं भागलपुर, बांका, बिहारशरीफ, और नवादा होते हुए गया पहुँची. अगले कुछ दिन हम यहीं से बाकी जगह आया-जाया करेंगे.

इस लंबे सफ़र में सच कहूँ तो यादगार रहा जहानाबाद का सफ़र, जहाँ पहली बार कारवाँ का पड़ाव था एक गाँव—काकोगाँव-जहानाबाद ज़िले से 12 किलोमीटर दूर.

उबड़खाबड़ सड़कें, चिलचिलाती धूप, या फिर धुआँ और धूल- दिक्कतें ज़रूर रहीं. लेकिन यकीन मानिए, हमेशा ये विश्वास कि श्रोताओ से मुलाकात तो होनी है, सो होगी ही.

लेकिन उस दिन विश्वास ज़रा डगमगाया. सब कुछ उल्टा जा रहा था. हर परिस्थिति विपरीत.

पहले तो अब तक के सफ़र में हमारे सारथी रहे प्रसादजी इतने बीमार हुए कि उन्हें सुबह-सुबह एम्बुलेंस के ज़रिए पटना भेजना पड़ा-अस्पताल.

दूसरे ड्राइवर का इंतज़ाम हुआ, वो मिला और सफ़र हुआ शुरू. लेकिन आधे घंटे बाद-गाड़ी ख़राब.

वो तो भाग्य ने पूरी तरह साथ नहीं छोड़ा कि समझिए मेकैनिक भी मिल गया. उसके सेवक कारो ने साष्टांग कर पलटी मारी, गाड़ी के अंदर-और ऐलान किया—“तुरन्ते ठीक कर देते हैं, एके घंटा में.”

अनुराधा प्रीतम एक प्रतिभागी के साथ
लोगों ने बीबीसी के प्रस्तुतकर्ताओं से मुलाक़ात की

एक घंटा ! इतना समय तो था नहीं. इस रेट से तो हम कार्यक्रम के बाद ही पहुँच पाते.

और जल्दी तो इतनी थी कि इन्दुशेखर अपनी लंबी टाँगों से एक बार में ही सड़क टाप गए. एक मोटरसाइकिल रोकी और ट्रिपलिंग करते हुए जा पहुँचे बस स्टैंड.

बस स्टैंड पर एक ही ट्रेकर और उसमें भी सवारी.

लेकिन हम भी बिहारी, वो भी बिहारी, उसपर बीबीसी भारी; बस वो हो गई खाली. लोगों ने कहा, “आपलोगन का जाना जरूरी है...कारवाँ आगे बढ़ना जरूरी है, हम तो अभी रुकियो सकते हैं.”

उस खाली गाड़ी में बैठकर आख़िरकार हमारे कारावाँ ने राहत की साँस ली, और भारत के किसी गाँव तक इस परिस्थिति में कितनी जल्दी में पहुँच पाना संभव है, उसका रिकॉर्ड बना.

कार्यक्रम शुरु होने के ठीक पाँच मिनट पहले हम काको गाँव में थे.

इस पूरे घटनाक्रम को मैं अपने टेपरेकार्डर पर रिकार्ड करती चली थी और जब अगले दिन ये सारा वृतांत श्रोताओं ने हमारे कार्यक्रम में सुना तो एक और दिलचस्प घटना घटी.

गया में औरंगाबाद के कुछ श्रोता आए हुए थे. हम भी सोचने लगे कि अगले दिन तो हम औरंगाबाद में ही होंगे. अपने कार्यक्रमों में इसकी घोषणा तो हो ही रही है. फिर आज ये यहाँ कैसे?

उनमें से एक ने कहा—“आज भोरे सुने थे कि आपकी गाड़ी ख़राब हो गई है. केतना दिक्कत हुआ आपलोग को. हमलोग एहीलिए आजे आ गए हियां ना कि आपलोग को हिएं सुन भी लेंगे, आ होगा तो हुआं हमही लोग ले चलेंगे, अपने ही साथे, गाड़ी में.”

हम कुछ न कह सके. काको गाँव जाने के लिए गाड़ी तो मिलना आसान लगा. यहाँ धन्यवाद के शब्द तलाशते रह गए.

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