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सोमवार, 22 मार्च, 2004 को 17:30 GMT तक के समाचार
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जहानाबाद में गूँजी आम आदमी की आवाज़

जहानाबाद में कारवाँ
लोगों ने कारवाँ में उत्साह से हिस्सा लिया
क़ानून और व्यवस्था किसकी ज़िम्मेदारी? ज़ाहिर है मंत्री की ज़िम्मेदारी, प्रशासन की ज़िम्मेदारी, सरकार की ज़िम्मेदारी, ऊँचे पदों पर बैठे लोगों की ज़िम्मेदारी. क्यों अक्सर ऐसा ही सोचते हैं न?

लेकिन आज जब बीबीसी का कारवाँ जहानाबाद ज़िले के काको गाँव में पहुँचा तो अहसास हुआ कि लोग इससे आगे भी सोचते हैं.

काको गांव के ताज हुसैन ने कहा कि क़ानून व्यवस्था निश्चित तौर पर सरकार की ज़िम्मेदारी है. लेकिन सरकार में जनता भी आती है. वो प्रतिनिधि हम चुनते हैं. इसलिए जनता अपनी ज़िम्मेदारी से बच नहीं सकती.

काको गाँव के ताज हुसैन की आवाज़ में हाँ में हाँ मिलाई भीम कुमार ने जो पास के लालसे बिगहा गाँव से इस कारवां का हिस्सा बनने आए थे.

उनका कहना था कि “ज़िम्मेदारी तो हमारी ज़रूर है. लेकिन माफ़िया का राज है. चाह कर भी वोट नहीं डाल सकते हैं.”

राजनीति का अपराधीकरण

तो घूम फिर कर बात बार बार राजनीति और अपराधीकरण पर आ जाती है. और हर बार अपराध से लोहा लेने के लिए एकजुट होते लोग कभी न कभी कहीं न कहीं विवश भी नज़र आए.

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बड़ी संख्या में लोगों की भागीदारी

काको गाँव में ही रहने वाली शशिकला ने कारवाँ के मंच से इस बात को खुल कर कहा.

शशिकला का मत था कि “लोग अगर जानते भी हैं कि अपराधी कौन है तो डर के मारे बताते ही नहीं.” उन्होंने मांग की कि उन्हें डर और भय मुक्त वातावरण चाहिए.

डर और भय मुक्त वातावरण? कम से कम आज ये जहानाबाद ज़िले में काको गाँव के मिडिल स्कूल के मैदान पर तो पूरे दो घंटे तक नज़र आया.

लोगों ने पूरी ज़िम्मेदारी ली. लेकिन वहाँ ज़िम्मेदारी किसकी जहाँ क़ानून बनते है? चयनपुरा गाँव के चितरंजन चयनपुरा ने तो इस पर पूरी एक कविता ही सुना दी. इसके कुछ अंश-

संसद सदस्य संसद में ही करने लगते हैं मार
बिल को लेकर काग़ज़ की भांति देते हैं फाड़
हर चुनाव में आकर करते हैं जनता से वादा
दिल्ली जाकर तोड़ रहे वो संसद की मर्यादा
संसद में भी फाड़े जाते हैं नारी के कपड़े
क़ानून बनाने वालों को क़ानून कहाँ तक पकड़े?

परिचर्चा के दौरान सवाल यह भी उठा कि उन क़ानूनों का क्या जो बनाए तो गए हैं लेकिन उनकी अवहेलना करने से हम स्वयं ज़रा संकोच नहीं करते?

मंच से इशारा साफ था- एक बार फिर निशाने पर थी जनता ख़ुद.

उदाहरण दिया गया कि क़ानून जो हमारे लिए बने उसके पालन की ज़िम्मेदारी किसकी? मसलन दहेज विरोधी क़ानून का उल्लंघन तो जनता ही करती है न.

तालियों की एक बार फिर गड़गड़ाहट हुई ..अब उम्मीद यही कि इस गूँज में ये गंभीर विचार कहीं खो कर न रह जाए.

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