| ऐसा है अब प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बीबीसी कारवां के दौरान एक पड़ाव से दूसरे पड़ाव तक के सफर में जगह-जगह लोगों से हुई मुलाक़ाते बार-बार याद आती हैं. उनकी शिकायतें, उनकी तारीफें, उनकी पसंद नापसंद सभी कुछ दिमाग में घुमता रहता है. बार-बार मैं अपनी डायरी को उठा कर उसमें चंद बातें लिख डालता हूँ. कोशिश यही कि अगली बार लोगों को शिकायतों का मौक़ा ही न मिलें. बिहार शरीफ़ से राजगीर जाते समय भी मैं कुछ वही कर रहा था. हमारे हँसमुख और बातूनी ड्राइवर प्रसाद से जब रहा न गया तो उन्होंने पूछा कि कहीं यहाँ आने के बाद मैने भी अपनी यात्रा वृतांत लिखने का फैसला तो नही कर डाला. इसके पहले मैं उन्हें कोई जवाब देता उन्होने तपाक से पूछ डाला कि आप चीनी यात्री फाह्यान की तरह बनेंगे या ह्वेन सांग की तरह. जब बात मेरी समझ में नही आई तो उन्होने समझाते हुए कहा कि बिहार के प्रसिद्ध नालंदा विश्वविद्यालय का हम ज़िक्र करेंगे भी या नहीं. छठी शताब्दी में भारत की यात्रा के दौरान चीनी यात्री फाह्यान नालंदा विश्वविद्यालय आए तो थे लेकिन उन्होंने कहीं उसका ज़िक्र नहीं किया. पहली बार यहाँ के बारे में पता चला ह्येन सांग की यात्राओं के वर्णनों में और फिर 1861 में इसे आधुनिक दुनिया के लिए एलेक्ज़ेंडर कनिंघम ने ढूँढ़ निकाला. नालंदा विश्वविद्यालय की सैर पता चला कि हम जिस रास्ते पर थे उसके बहुत ही क़रीब नालंदा विश्वविद्यालय स्थित है. बस फिर क्या हमने भी मौका ताड़ा और गाड़ी उस ओर घुमा ली.
इस प्राचीन ऐतिहासिक स्थल के रखरखाव का काम निरंतर चल रहा है. सभी दीवारों पर रसायन की एक लेप लगाई जा रही थी. ये काम साल में एक बार किया जाता है जिससे कि दीवारों को नुक़सान न पहुँचे. जिस ज़मीन पर हम खड़े थे वहाँ कभी बड़ी-बडी कक्षाओं में प्रसिद्ध विद्वानों ने शिक्षा ग्रहण की होगी ये सोच कर ही हम अभीभूत हो रहे थे. 1500 साल पुराने इस विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र से लेकर भूगोल और रसायन शास्त्र सभी कुछ पढ़ाया जाता था. पढ़ाई का माध्यम पाली भाषा हुआ करती थी. 16 सौ साल पुराने इस स्थल को देखने हर दिन देश-विदेश के लगभग 250 पर्यटक आते हैं. इनमें ज़्यादातर बर्मा, थाईलैंड और श्रीलंका से आते हैं. कुछ लोगों से जब मैने बात की तो उन्होने एक तरफ तो नालंदा विश्वविद्यालय के रखरखाव के लिए किए जा रहे प्रयासों की प्रशंसा की लेकिन वहीं आसपास रहने ठहरने की उचित व्यवस्था न होने पर चिंता जताई. ज़ाहिर है जिस जगह को देखने समझने में कई दिन लग जाते हैं वहाँ से दिन ढलने के पहले ही निकलने के लिए मजबूर होना...अब अफसोस तो होगा ही. |
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