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मंगलवार, 09 मार्च, 2004 को 17:09 GMT तक के समाचार
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कबीर और बुद्ध के घर से लौटकर मन में उठते सवाल

गौतम बुद्ध की प्रतिमा
कुशीनगर में गौतम बुद्ध का महानिर्वाण स्थल
होली के बाद जब पटना से सुपौल के रास्ते हमारी टीम निकली तो हम तैयार थे पूरी तरह से कठिन सफ़र के लिए.

लंबे सफर आपको कई बार मौक़ा देते हैं कि आँख मूंदे आप उन इंप्रेशन्स को, तस्वीरों को मन ही मन दोबारा देखें जिसने आपको एक बार ठिठकने पर मजबूर किया था लेकिन कभी ज़्यादा ठहरने का मौक़ा नहीं मिला.

लगा कि चलिए अच्छा है आठ घंटे छक कर पुरानी यादें ताज़ा करेंगे...पटना से हिचकोले खाते हम निकले और मेरी अस्पष्ट तस्वीरों की यात्रा भी शुरू हो गई.

कबीर-बुद्ध और सवाल

बिहार का दौरा शुरू करने से पहले हमने उत्तरप्रदेश का दौरा किया था और जब गोरखपुर रूकना हुआ तो कबीर की कर्मस्थली मगहर भी जाना हुआ.

हम वहाँ कबीर की समाधि पर तब पहुँचे थे जब सुबह की पूजा हो रही थी.

तीस “दास” रहते हैं उस बड़े से परिसर में.

कबीर और बुद्ध ने पूरी ज़िंदगी पूजा पाठ के आडंबर के खिलाफ लड़ाई लड़ी. जीते जी तो वो इनसे जीत गए लेकिन मरने के बाद.....उनकी भी एक न चली

सुखद आश्चर्य हुआ कि जहाँ कबीर की मृत्यु हुई उस जगह को सजा संवार कर, उसकी अच्छी देखभाल की जा रही है. नहीं तो अपनी विरासत को भुलाने में हमें समय कहाँ लगता है?

खूब बड़ा सा आहाता है. परिसर के अंदर बिजली, पानी, फ़ोन सबकी अच्छी व्यवस्था है और पूजा पाठ की भी.

चलिए कबीर साहब की जगह की अच्छी देखभाल हो रही है. हालांकि मन में कुछ सवाल रह गए. उन्हीं सवालों को समेटे हम कुशीनगर पहुँचे.

कुशीनगर में जहाँ बुद्ध को महानिर्वाण प्राप्त हुआ. वहीं उनकी एक लेटी हुई लंबी सी प्रतिमा है.

वहाँ भी भक्तों की भीड़. पूजा के लिए फूल, अगरबत्ती. अपने भगवान को ठंड से बचाने के लिए दवाईयाँ, कंबल सबका इंतजाम करते है. भई भगवान हैं सो तो ठीक पर ठंड तो किसी को भी लग सकती है. दवाई का इंतज़ाम होना बुरा नहीं.

कबीर और बुद्ध ने पूरी ज़िंदगी पूजा पाठ के आडंबर के खिलाफ लड़ाई लड़ी. जीते जी तो वो इनसे जीत गए लेकिन मरने के बाद.....उनकी भी एक न चली.

पर मन मे सवाल ये भी उठा कि भक्त अपने भगवान से प्यार भी तो कितना करते हैं. ये सब जतन प्यार और आस्था के कारण ही तो करते हैं.

आस्था, विश्वास और सिद्धांत की जंग शुरू हो गई थी.

हमारी गाड़ी कहीं रुकी और मेरी सोच को भी ब्रेक लगा.

शास्त्री जी के घर

हम खगड़िया से आगे आ चुके थे. रास्ता तो बहुत ही उबड़-खाबड़ था. मतलब उसे रास्ता कहना भी ज्यादती होगी. धूल धूसरित सड़को के किनारे लाल सेमल के फूल बहुत सुंदर दिख रहे थे. तपती दोपहर के रेगिस्तान में मानों सुर्ख गुलाब खिल उठा हो. रंग वो भी सुर्ख़ बेजान सी दिखती चीज़ों में भी कैसे जान डालते हैं, है न! इसीलिए तो खून का रंग लाल होता है.धक्-धक् करता.

खूब सारे दूध में बनी चाय पीकर हमारा कारवाँ फिर शुरू हुआ. मेरी पलकें फिर मूंद गईं. ये तस्वीर बहुत स्पष्ट दिख रही थी.

 आइए हाथ उठाएँ हम भी/ हम जिन्हें हर्फ़े दुआ याद नहीं/ हम जिन्हें सोज़े मोहब्बत के सिवा/ कोई बुत कोई ख़ुदा याद नहीं

मुज्जफ़रपुर में साहित्यकार आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री के घर जाना हुआ था.

शास्त्री जी की काफी उम्र हो चुकी है. वे काफी अस्वस्थ थे. लेकिन उनके चारों तरफ ढेर सारे कुत्ते थे. वो भी सड़क के कुत्ते, जिनकी बदबू से पूरा घर भरा पड़ा था. लेकिन शास्त्री जी इनसे अगाध स्नेह करते हैं.

उनका कहना था इंसानों से विश्वास उठ गया है उनका. शास्त्री जी की पत्नी छाया देवी हमारा सत्कार कर रही थीं. आखों में मानवीय संबंधों के लिए खूब सारे विश्वास को घोले.

हमारे बहुत आग्रह पर शास्त्री जी की कुछ कविताएँ सुनाईं उन्होंने. जितनी देर उनसे बात हुई हर बात सिर्फ अपने पति और उनकी रचना से जुड़ी. इस उम्र में भी अपने हमसफ़र की उपलब्धियों को गिनाते समय उनके चेहेरे पर एक नई रौनक झलक पड़ती दिखाई दी.

प्यार लोगों को कितना ज़िंदा रखता है.

‘आइए हाथ उठाएँ हम भी

हम जिन्हें हर्फ़े दुआ याद नहीं

हम जिन्हें सोज़े मोहब्बत के सिवा

कोई बुत कोई ख़ुदा याद नहीं’

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