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'मैं आज़मगढ़ की तो नहीं.......' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
मेरी पैदाइश और परवरिश लंदन में हुई लेकिन मैं भारतीय मूल की हूँ. चार पीढ़ी पहले, मेरे पूर्वज भारत से गयाना चले गए थे– मैं बीबीसी हिंदी कारवाँ के साथ, भारत में तीन सप्ताह बिताने के लिए काफ़ी उत्सुक थी. लंदन के स्टूडियो में बीबीसी हिंदी टीम के प्रसारणों के नए स्वरूप को तैयार करने में मेरा लगातार सहयोग रहा है इसलिए बीबीसी हिंदी के कारवाँ के साथ मेरा भारत-दौरा काफ़ी सहज लग रहा है. उन्नीस फ़रवरी को सवेरे-सवेरे दिल्ली पहुँचने के बाद, हमारे तय यात्रा-कार्यक्रम में कुछ उलट-फेर हो जाने के कारण, 20 फ़रवरी को मुझे और आलोक जोशी को अचानक रात के वक़्त सड़क से लखनऊ से आज़मगढ़ जाना पड़ा. ऊबड़-खाबड़ रास्ता सफ़र तो सिर्फ़ छह घंटे का था लेकिन रास्ता काफ़ी ऊबड़-खाबड़ था. रात के वक़्त लोगों को तरह-तरह की सवारियों से या पैदल ही एक जगह से दूसरी जगह जाते देख कर मैं दंग-सी रह गई और चारों तरफ़ कारों के हॉर्न लगातार बज रहे थे, जिन्हें सुनने की मैं आदी नहीं हूँ. अपने इस सफ़र के दौरान, हम थोड़ी देर के लिए चाय के लिए रुके और आलोक पीने के लिए बोतलबंद पानी ले आए.
हम सुबह पाँच बजे अपनी मंज़िल पर पहुँचे और अगले दिन का कार्यक्रम शुरू करने से पहले हम कुछ आराम कर पाए, जिसकी हमें सख़्त ज़रूरत थी. मैं वहाँ पहुँच कर अपने सहकर्मी और स्टूडियो मैनेजर, हनीफ़ सलाउद्दीन की ज़िम्मेदारी सँभाल रही हूँ और जब वह हमारे पास आए तो मैंने उन्हें क्रिस्प्स का वो बैग दिया, जो मैं उनके लिए लंदन से लाई थी. हनीफ़ ने मुस्कुराकर क्रिस्प्स ले लिए. नाश्ते के वक़्त, हनीफ़ ने मुझे बताया कि बीबीसी हिंदी का कारवाँ कैसे काम करता है और अब हमें क्या-क्या करना है. मैने हनीफ़ से रिकार्डिंग का सारा साज़ो-सामान भी ले लिया जिसमें एक भारी-भरकम केस था, एक मिक्सिंग डैस्क, कई तरह के केबल, चार माइक्रोफ़ोन, चार रिकार्डिंग उपकरण, एक सैटेलाइट डिश और एक आइएसडीएन फ़ोन का यूनिट था. दो दिनों में केवल छह घंटे की नींद मिल पाने तथा लंदन से विमान-यात्रा की थकान के कारण, आज़मगढ़ में मेरा पहला रोड शो बहुत बढ़िया नहीं रहा. 'ये आज़मगढ़ से हैं?' मैं सात माइक्रोफ़ोनों से आने वाली आवाज़ें मिक्स कर रही हूँ और रूपा के साथ मिल कर, आजकल कार्यक्रम के लिए एक पैकेज तैयार कर रही हूँ.
आलोक श्रोताओं की भीड़ में एलान करते हैं कि मेरा परिवार मूल रूप से भारत से है. भीड़ में से कोई कहता है, “ये आज़मगढ़ से हैं”, लेकिन क्योंकि मैं हिंदी नहीं बोलती और मैं अपना काम करने में व्यस्त हूँ इसलिए मुझे पता ही नहीं चला कि उन्होंने क्या कहा है और उन्हें अपनी बात का अनुवाद करना पड़ा. असल में मुझे मालूम ही नहीं है कि मेरे पूर्वज कहाँ पैदा हुए थे, सो शायद ये सच ही हो! यहाँ श्रोताओं से मिलकर मुझे बहुत ही अच्छा लग रहा है, जब हम स्टूडियो मैनेजर हिंदी प्रसारणों के लिए काम करते हैं, ख़ास तौर पर आज के दिन कार्यक्रम के लिए तो लंदन में आधी रात गुज़र चुकी होती है और उस वक्त इस बात की कल्पना करना काफ़ी मुश्किल होता है कि लोग हमें सुन रहे होंगे. पर अब मुझे लगता है कि अगर हम ये सोच लेते कि कितने लोग हमारा प्रसारण सुन रहे हैं तो शायद हमारे हाथ-पैर फूल जाते और हम ग़लतियाँ करने लगते! रोड शो के बाद, हनीफ़, रूपा और मैं कार में सवार हो जाते हैं, आलोक और मैल्कम श्रोताओं को अपने ऑटोग्राफ़ दे रहे हैं. हालाँकि आज का रोड शो अब ख़त्म हो गया है लेकिन हमारा असली काम अब शुरू होता है - पाँच मिनट की रिपोर्ट बनाकर लंदन भेजने के लिए हमारे पास चार घंटे का समय है जहाँ से इसे आजकल कार्यक्रम में प्रसारित किया जाएगा. मेरा होटल का कमरा बीबीसी ऑफ़िस और स्टूडियो में बदल जाता है! रूपा ने सबसे ज़्यादा दिलचस्प सवालों का विवरण तैयार कर लिया है और वो अपनी स्क्रिप्ट लिखने लगती हैं जबकि हनीफ़ रोड शो की तस्वीरों को लैपटॉप पर लोड करने लगते हैं जिन्हें बीबीसीहिंदी.कॉम के लिए लंदन भेजना है. फिर हनीफ़ कार से वाराणसी जाने के लिए रवाना हो जाते हैं जहाँ से वे विमान के ज़रिए दिल्ली होते हुए वापस लंदन जाएँगे. होटल के कमरे में खुरदरी दीवारों और फ़र्श के कारण आवाज़ गूँजती है इसलिए मैं अपने कमरे की अलमारी और कंबल से एक छोटा-सा बूथ बना लेती हूँ और हम रूपा की आवाज़ को रिकॉर्ड करने लगते हैं. फिर मैं रूपा की आवाज़ के साथ रोड शो में शामिल लोगों की आवाज़ें मिलाती हूँ और हम सेटैलाइट डिश लगाने छत पर जाते हैं ताकि हम अपनी फ़ाइल लंदन भेज सकें. हम कामयाब हो गए हैं और पूरी टीम में उल्लास की भावना देखी जा सकती है, यह हमारा पहला रोड शो था और ये निर्बाध रूप से पूरा हो गया है! हमारा अगला पड़ाव, बस्ती... |
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