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बुधवार, 18 फ़रवरी, 2004 को 16:39 GMT तक के समाचार
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अभिव्यक्ति की आज़ादी पर बहस

बीबीसी का कारवाँ
बीबीसी के श्रोताओं ने अपने विचार खुलकर रखे
आज जब बीबीसी हिंदी का कारवाँ आज़मगढ़ पहुँचा तो हमने विचार मंच के लिए विषय चुना--अभिव्यक्ति की आज़ादी.

बोलने के लिए मंच पर मौजूद थे स्थानीय मुख्य विकास अधिकारी जेपी त्रिपाठी, समाजसेवी माधुरी सिंह, मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव आफ़ताब अहमद और एक बेरोज़गार नौजवान मनोज प्रजापति.

तेज़ धूप झेलते हुए सैकड़ों लोग वहाँ मौजूद थे, बहस तेज़ी से गर्माने लगी, लोग अपने विचार रखने को आतुर थे और बीबीसी का मंच था इसलिए हर तरह के विचार खुलकर सामने आने लगे.

विषय जब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हो तो फिर बंधन कैसा, लोगों ने अभिव्यक्ति को पूरी आज़ादी देने की बात कही तो कुछ लोगों ने कहा कि इसका दुरूपयोग नहीं होना चाहिए और इसकी सीमा होनी चाहिए.

लोगों ने स्थानीय मुद्दे तो उठाए ही, साथ ही इराक़ पर अमरीकी हमले जैसे सवालों पर भी अपनी राय रखी.

जिन लोगों को बोलने का मौक़ा मिला वे जमकर बोले और जो माइक नहीं थाम सके उन्होंने अपने विचार लिखकर हम तक भेजे.

विचार मंच में भाग लेने वाले ज़्यादातर लोग नौजवान थे जिनकी बातों में कभी ग़ुस्सा झलक रहा था तो कभी पिंजरे में बंद पंछी की तरह छटपटाहट.

हर कोई बोलने को आतुर था और एक विचार से कई-कई विचार निकल रहे थे, बोलने की आज़ादी कितनी होनी चाहिए, किसे होनी चाहिए, किसके बारे में बोलना चाहिए, कोई दुरूपयोग करे तो उसे कैसे रोकना चाहिए, कितना संयम और अनुशासन ज़रूरी है...वग़ैरह-वग़ैरह.

खुला मंच

एक स्थानीय लेखक जो वहाँ मौजूद थे उन्हें बहस का तरीक़ा पसंद नहीं आया, उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि ऐसे गंभीर मुद्दे पर गंभीर ढंग से बात की जानी चाहिए.

कारवाँ
कारवाँ में बड़ी संख्या में लोग मौजूद थे

ज़ाहिर है, उन्होंने भी अपनी अभिव्यक्ति की आज़ादी का इस्तेमाल किया और बहस के तरीक़े पर ऐतराज़ जताया.

आख़िर बीबीसी का मंच ठहरा, सही मायने में यह अभिव्यक्ति की आज़ादी का मंच था, खुलकर बोलने का, आलोचना करने का, सबने अपने मन की बात कही.

लेकिन हमेशा की तरह समय की कमी के कारण बहुत कुछ छूट सा गया, अधूरा रहा, लेकिन संतोष इस बात का था कि बहस का कोई सिरा हाथ तो आया.

ऊपर से बहुत शांत और अलसाई सी दिखने वाली ज़िंदगी में अगर सवालों की सुगबुगाहट महसूस हो तो अच्छा लगता है, शायद बीबीसी ने आज़मगढ़ के लिए और आज़मगढ़ ने बीबीसी के लिए यही किया.

मगर अभी रुकना कहाँ, बीबीसी का कारवाँ तो चलता रहेगा, नई सवालों, नई जिज्ञासाओं और नए दोस्तों की तलाश में.

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