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बुधवार, 14 जनवरी, 2004 को 10:36 GMT तक के समाचार
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कुमारतुंगा पर घमंडी होने का आरोप
विक्रमसिंघे और कुमारतुंगा
दोनों के बीच मतभेद गहरे होते जा रहे हैं

श्रीलंका के प्रधानमंत्री रनिल विक्रमसिंघे ने कहा है कि राष्ट्रपति चंद्रिका कुमारतुंगा सत्ता के मद में घमंडी हो गई है.

रनिल विक्रमसिंघे को कुमारतुंगा का सत्ता प्रतिद्वंद्वी माना जाता है.

राष्ट्रपति चंद्रिका कुमारतुंगा ने मंगलवार को यह कहकर सबको चौंका दिया था कि एक गुप्त शपथ समारोह में उनके कार्यकाल को 2006 तक के लिए बढ़ा दिया गया है.

प्रधानमंत्री रनिल विक्रमसिंघे के एक प्रवक्ता जीएल पीरिज़ ने राष्ट्रपति कुमारतुंगा का यह क़दम अलोकतांत्रिक और ग़ैरक़ानूनी है.

कुमारतुंगा और विक्रमसिंघे के बीच तनाव से तमिल विद्रोहियों के साथ चल रही वार्ता रुक गई है.

चंद्रिका कुमारतुंगा का कहना है कि 1999 में उन पर हुए क़ातिलाना हमले की वजह से उन्होंने समय से पहले शपथ ले ली थी जबकि उन्हें शपथ 2000 में लेनी थी.

उनका कहना है कि इसकी वजह से उनका छह वर्ष का कार्यकाल 2006 तक चलेगा.

सरकारी टेलीविजन पर उन्होंने कहा, ''यह मुझ पर निर्भर करता है कि मैं 2006 तक राष्ट्रपति बनी रहूँ या नहीं.''

घमंड स्वीकार नहीं

 किसी सार्वजनिक पद पर कार्यकाल के संबंध में इतना घमंड स्वीकार नहीं किया जा सकता.

प्रधानमंत्री के प्रवक्ता

प्रधानमंत्री के प्रवक्ता जीएल पीरिज़ ने पत्रकारों से कहा कि राष्ट्रपति को अपना बद अगले साल के अंत में ही छोड़ देना चाहिए.

"किसी सार्वजनिक पद पर कार्यकाल के संबंध में इतना घमंड स्वीकार नहीं किया जा सकता."

उन्होंने कहा कि किसी सार्वजनिक पद पर बैठा व्यक्ति अपने पद पर टिके रहने या हटने के बारे में ख़ुद ही फ़ैसला नहीं कर सकता.

पीरिज़ ने कहा कि राष्ट्रपति ने अपना कार्यकाल बढ़ाने की जो घोषणा की है उसका कोई क़ानूनी आधार उन्हें नज़र नहीं आता.

कानूनी पेंच

दरअसल जब तमिल विद्रोहियों ने उन पर हमला किया था तो यह दिखाने के लिए कि हमले के बाद भी वे स्वस्थ हैं और राष्ट्रपति बनी रह सकती हैं उन्होंने 1999 में ही शपथ ले ली थी.

जबकि उनका पहला कार्यकाल 2000 तक चलना था.

चंद्रिका कुमारतुंगा
कुमारतुंगा गुप्त शपथ लेने की बात कर रही हैं

उनका कहना है कि संविधान के अनुसार दूसरा कार्यकाल 2006 तक चलना चाहिए.

हालांकि इससे पहले श्रीलंका के लोग मानते आए हैं कि उनका कार्यकाल 2005 तक ही है क्योंकि उन्हें इस बात की कोई जानकारी नहीं है कि 2000 में भी राष्ट्रपति ने कोई शपथ ली थी.

कुमारतुंगा का कहना है कि उन्होंने दूसरे शपथ ग्रहण के लिए कड़ी गोपनीयता बरती लेकिन वे मानती हैं कि उनके दूसरे शपथ ग्रहण के समय सिर्फ़ दो लोग मौजूद थे, एक मुख्य न्यायाधीश सरथ सिल्वा और दूसरे विदेश मंत्री लक्ष्मण कादिरगमार.

बीबीसी की संवाददाता फ़्रांसिस हैरिसन का कहना है कि राष्ट्रपति ने अपने कार्यकाल को लेकर यह दावा करके खेल ही बदल दिया है.

उनका कहना है कि चूँकि राष्ट्रपति पर कोई मुक़दमा नहीं चल सकता इसलिए उनके इस दावे को लेकर किसी भी अदालत में चुनौती भी नहीं दी जा सकती.

जबकि संविधान के विशेषज्ञों का कहना है कि समस्या दरअसल संविधान में है.

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