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बुधवार, 05 नवंबर, 2003 को 05:00 GMT तक के समाचार
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कुमारतुंगा-विक्रमसिंघे: नए नहीं हैं मतभेद
प्रधानमंत्री रनिल विक्रमसिंघे और राष्ट्रपति चंद्रिका कुमारतुंगा
दोनों के बीच राजनीतिक दुश्मनी मानी जाती है

श्रीलंका की राष्ट्रपति चंद्रिका कुमारतुंगा के तीन मंत्रियों को बर्ख़ास्त करके संसद को निलंबित करने से राजनीतिक संकट उत्पन्न हो गया है.

राष्ट्रपति कुमारतुंगा ने रक्षा, सूचना और आंतरिक सुरक्षा मंत्रियों को बर्ख़ास्त कर दिया.

यह बर्ख़ास्तगी ऐसे दिन आई जब प्रधानमंत्री रनिल विक्रमसिंघे तमिल विद्रोहियों के शांति प्रस्तावों के बारे में अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश से वाशिंगटन में चर्चा करने वाले थे.

प्रधानमंत्री रनिल विक्रमसिंघे राष्ट्रपति चंद्रिका कुमारतुंगा में पुरानी राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता है.

राष्ट्रपति चंद्रिका कुमारतुंगा प्रधानमंत्री रनिल विक्रमसिंघे के तमिल विद्रोहियों के साथ शांति प्रयासों की कड़ी आलोचना करती आईं हैं.

उनकी दलील रही है कि प्रधानमंत्री रनिल विक्रमसिंघे तमिल छापामारों को छूट देकर देश के पूर्वी हिस्से में सुरक्षा स्थिति को जानबूझकर ख़राब होने दे रहे हैं.

राष्ट्रपति कुमारतुंगा की पार्टी पीपुल्स अलायंस लगातार आरोप लगाती आई है कि तमिल चरमपंथियों ने सरकार के साथ संघर्षविराम का फ़ायदा उठाते हुए नए अड्डे स्थापित किए हैं.

इसके पहले राष्ट्रपति कुमारतुंगा प्रधानमंत्री विक्रमसिंघे की बर्ख़ास्तगी की धमकी भी दे चुकी हैं.

रनिल विक्रमसिंघे की यूनाइटेड नेशनल पार्टी ने दिसंबर 2001 के संसदीय चुनावों में चंद्रिका कुमारतुंगा की पीपुल्स अलायंस को हराकर सरकार बनाई थी.

दरअसल, श्रीलंका में राष्ट्रपति और केंद्र सरकार के लिए अलग-अलग चुनाव होते हैं.

राष्ट्रपति के रूप में चंद्रिका कुमारतुंगा जीतीं और केंद्र सरकार में रनिल विक्रमसिंघे के नेतृत्ववाली विपक्षी पार्टी जीत गई.

पर्यवेक्षकों का मानना है कि मंत्रियों की बर्ख़ास्तगी से दोनों नेताओं के बीच संबंध सुधरने की बची-खुची उम्मीद भी ख़त्म हो गई है.

राष्ट्रपति कुमारतुंगा के संसद को निलंबित करने और तीन मंत्रियों को बर्ख़ास्त करने के फ़ैसले से राजनीतिक प्रेक्षक भी अचंभित हैं.

इसके पहले किसी राष्ट्रपति ने अपने ऐसे संवैधानिक अधिकार का इस्तेमाल नहीं किया है.

बीबीसी संवाददाता फ्रांसिस हैरीसन का कहना है कि राजनीतिक प्रेक्षक मान रहे हैं कि इससे बेहतर होता कि वे प्रधानमंत्री विक्रमसिंघे को बर्ख़ास्त करतीं क्योंकि प्रमुख मंत्रियों के बिना प्रधानमंत्री सही तरीके से काम नहीं कर पाएँगे.

कुमारतुंगा के इस क़दम से नार्वे की मध्यस्थता से तमिल छापामारों के साथ चल रही शांति प्रक्रिया भी संकट में पड़ गई है.

अब उनका क्या होगा, सब कुछ अनिश्चय के घेरे में है.

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