|
| |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
श्रीलंका में शांति प्रक्रिया के विरोध में रैली
श्रीलंका में शांति स्थापना की प्रक्रिया के विरोध में हज़ारों लोगों ने कोलंबो में रैली की है. श्रीलंका की प्रमुख विपक्षी पार्टी के समर्थक तमिल विद्रोहियों के साथ जिस तरह से शांति प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जा रहा है उसके विरोध में नारे लगा रहे थे. विपक्षी प्रवक्ता मैत्रीपाल श्रीसेना ने कहा कि अगले दो महीने में इन प्रदर्शनों को प्रांत स्तर तक ले जाया जाएगा जिससे सरकार पर दबाव बन सके और वह विद्रोहियों के साथ बहुत रियायत नहीं करे. रैली से एक ही दिन पहले श्रीलंका की प्रमुख विपक्षी पार्टी की नेता और देश की राष्ट्रपति चंद्रिका कुमारतुंग ने कहा था कि शांति वार्ता के मध्यस्थ नॉर्वे के जनरल को हटा दिया जाना चाहिए. श्रीसेना ने एएफ़पी समाचार एजेंसी से बातचीत में प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे पर आरोप लगाया कि वह देश को तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं. कूटनीतिक आश्चर्य में कूटनीतिकों ने नॉर्वे के मध्यस्थ को हटाने की राष्ट्रपति कुमारतुंग की ओर से आई माँग के प्रति आश्चर्य जाहिर किया है. एक एशियाई कूटनीतिक का कहना था, "हमें पता था कि राष्ट्रपति ख़ुश नहीं हैं मगर किसी ने भी नहीं सोचा था कि वह इस तरह की माँग भी रख सकती हैं." उनके अनुसार इसके बाद नॉर्वे की अपनी स्थिति थोड़ी मुश्किल भरी हो गई है. उधर नॉर्वे ने अभी तक श्रीलंका की राष्ट्रपति की इस माँग का कोई जवाब नहीं दिया है. प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे जिस तरह से शांति प्रक्रिया को आगे बढ़ा रहे हैं उससे राष्ट्रपति कुमारतुंग काफ़ी समय से नाराज़ रही हैं. राष्ट्रपति की पार्टी को दिसंबर 2001 में प्रधानमंत्री विक्रमसिंघे की पार्टी से मात मिली थी और उसके बाद शुरू हुई शांति प्रक्रिया को राष्ट्रपति का पूरा समर्थन नहीं मिला है. |
| |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||