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बुधवार, 14 जनवरी, 2004 को 00:50 GMT तक के समाचार
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श्रीलंका में सांवैधानिक संकट की संभावना
कुमारतुंगा और विक्रमसिंघे
कुमारतुंगा और विक्रमसिंघे के बीच की खाई बढ़ती ही जा रही है

श्रीलंका में राष्ट्रपति चंद्रिका कुमारतुंगा और प्रधानमंत्री रनिल विक्रमसिंघे के बीच खाई और बढ़ती जा रही है. अब राष्ट्रपति कुमारतुंगा ने कहा है कि संविधान के अनुसार वह एक साल और पद पर रह सकती हैं.

दोनों नेताओं के बीच तनातनी के चलते ही तमिल विद्रोहियों के साथ किसी भी तरह की शांति वार्ता रुकी हुई है.

राष्ट्रपति कुमारतुंगा के अनुसार उन्होंने दूसरी बार वर्ष 2000 में शपथ ली थी क्योंकि 1999 में तमिल विद्रोहियों की ओर से की गई हत्या की कोशिश की वजह से उन्हें ज़बरदस्ती शपथ लेनी पड़ी थी.

उनके अनुसार इस वजह से उनका छह वर्ष का कार्यकाल 2006 तक चलेगा.

राष्ट्रपति ने कहा, "मुझे वर्ष 2006 तक राष्ट्रपति पद पर रहना है या नहीं ये फ़ैसला लेने का अधिकार मेरे पास है."

उनका कहना है कि तमिल विद्रोहियों ने उन पर 1999 में जानलेवा हमला किया इसकी वजह से उन्हें ये दिखाने के लिए कि वह ठीकठाक हैं, उस वर्ष शपथ लेनी पड़ी थी.

राष्ट्रपति के अनुसार उनका पहला कार्यकाल 2000 में पूरा हो रहा था और इस हिसाब से उन्हें 2006 तक दूसरा कार्यकाल मिला है.

वैसे अभी तक श्रीलंका में यही माना जा रहा है कि उनका कार्यकाल वर्ष 2005 में ख़त्म हो रहा है.

वहाँ मौजूद बीबीसी संवाददाता फ़्रांसिस हैरिसन का कहना है कि संविधान राष्ट्रपति की सत्ता को चुनौती नहीं दे सकता इसलिए उनके विरोधियों के पास करने के लिए बहुत कुछ नहीं होगा.

उधर कोलंबो विश्वविद्यालय में संविधान विशेषज्ञ रोहन इदरीसिन्हा का कहना है कि राष्ट्रपति सही भी हो सकती हैं.

उनके अनुसार जिस तरह संविधान की भाषा है उसे देखते हुए ये एक समस्या बन सकती है.

राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के बीच विवाद का विषय तमिल विद्रोहियों के साथ शांति वार्ता है.

राष्ट्रपति का कहना है कि विक्रमसिंघे ने फ़रवरी 2002 में हुए संघर्ष विराम के दौरान काफ़ी सुविधाएँ तमिल विद्रोहियों को दे दी हैं.

प्रधानमंत्री रोज़मर्रा का शासन भले ही चला रहे हों मगर सेना पर और शासन को हटाने का अधिकार राष्ट्रपति के पास ही हैं.

इस बारे में प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से तुरंत ही कोई टिप्पणी नहीं की गई है.

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