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शांति प्रक्रिया संकट में पड़ने की चेतावनी
श्रीलंका में विद्रोहियों के साथ प्रमुख वार्ताकार ने चेतावनी दी है कि राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के बीच का तनाव तमिल छापामारों के साथ शांति प्रक्रिया को नुक़सान पहुँचा सकता है. मुख्य वार्ताकार जीएल पेइरिस ने राष्ट्रपति चंद्रिका कुमारतुंगा की आलोचना की और कहा है कि उनके पास रक्षा मंत्रालय का ज़िम्मा है फिर भी वे शांति प्रक्रिया की ज़िम्मेदारी लेने से मना कर रही हैं. पेइरिस का कहना था कि प्रधानमंत्री रनिल विक्रमसिंघे तमिल छापामारों के साथ तब तक सार्थक बातचीत नहीं कर सकते हैं जब तक कि उनके अधिकार में रक्षा मंत्रालय न हो.
बीबीसी संवाददाता का कहना है कि राष्ट्रपति कुमारतुंगा ने नवंबर में तीन मंत्रियों को बर्ख़ास्त कर और उनके मंत्रालयों को अपने अधिकार में ले लिया था. इसमें रक्षा मंत्रालय भी शामिल था और इससे शांति प्रक्रिया संकट में पड़ गई थी. इसके पहले श्रीलंका की शांति वार्ता में मध्यस्थता कर रहे नॉर्वे के वार्ताकारों ने कहा था कि शांति प्रक्रिया तब तक स्थगित रहेगी जब तक राष्ट्रपति चंद्रिका कुमारतुंगा और प्रधानमंत्री रनिल विक्रमसिंघे के बीच सत्ता संघर्ष समाप्त नहीं हो जाता. नॉर्वे के विदेश उपमंत्री विदार हेलगेसेन ने स्पष्ट कर दिया था कि मध्यस्थ इसमें ज़्यादा कुछ नहीं कर सकते. श्रीलंका सरकार और तमिल विद्रोहियों के बीच फ़रवरी, 2002 में हुए संघर्ष विराम में नॉर्वे के मध्यस्थों की प्रमुख भूमिका थी. लेकिन इस साल अप्रैल से ही ये शांति वार्ता स्थगित है क्योंकि तमिल विद्रोही अंतरिम स्वायत्तता की माँग कर रहे हैं. इधर, राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के बीच एक तरह का सत्ता संघर्ष छिड़ा हुआ है जिसमें प्रधानमंत्री विद्रोहियों के साथ दीर्घकालिक शांति चाह रहे हैं जबकि राष्ट्रपति का आरोप है कि प्रधानमंत्री तमिल विद्रोहियों को काफ़ी छूट दे रहे हैं. राष्ट्रपति कुमारतुंगा ने रक्षा, गृह और सूचना विभाग प्रधानमंत्री से वापस ले लिए थे और इस तरह विवाद ने और तूल पकड़ लिया. |
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